अंकल जॉर्ज स्कूल की नौकरी से रिटायर हो चुके थे। उनके मोहल्ले में एक बड़ा-सा पार्क था, जो काफी नामी था। दूर-दूर से लोग पार्क में टहलने और झूला झूलने आया करते थे। मोहल्ले की सोसाइटी एक अच्छे माली की तलाश कर रही थी। अंकल जॉर्ज ने जब अपना नाम सुझाया, तो सभी हैरत में पड़ गए। लेकिन अंकल जॉर्ज से अच्छा और सुयोग्य माली उन्हें कहां मिलेगा! अतः एक हेल्पर के साथ अंकल जॉर्ज को पार्क के रख-रखाव का काम सौंप दिया गया।
अंकल जॉर्ज रोज सुबह-शाम चार-चार घंटे पार्क के रख-रखाव में लगाते थे। पार्क में लगा एक-एक पेड़ वह अपने हाथों से सींचते थे। कुछ ही दिन में पार्क पहले से कई गुना ज्यादा खूबसूरत दिखने लगा। उसमें रंग-बिरंगे मौसमी फूल आने लगे। एक दिन एक बड़ी कंपनी के मालिक उस पार्क की सैर करने आए। उन्हें वह पार्क बहुत खूबसूरत लगा। उन्होंने पार्क के माली को तलब किया। जब अंकल जॉर्ज उनसे मिलने पहुंचे, तो कंपनी के मालिक ने उनसे पूछा, इस पार्क के रख-रखाव के लिए आपको कितने पैसे मिलते हैं?
अंकल जॉर्ज मुस्काराए और बोले, सर, बस इतना कि घर का गुजारा हो जाए। कंपनी के मालिक बोले, मैं उससे दस गुना ज्यादा पैसे देने को तैयार हूं। आप मेरी कंपनी में नौकरी करने आ जाइए। अंकल जॉर्ज बोले, सर, मेरे पढ़ाए हुए बच्चे आज देश-विदेश की कई बड़ी कंपनियों में ऊंचे ओहदे पर कार्यरत हैं।
मेरे पास हमेशा यह विकल्प रहा कि मैं खुद को बना लूं, या फिर उनको बना दूं, जो मेरे ऊपर निर्भर करते हैं। और मैंने हमेशा दूसरा विकल्प चुना। ये पौधे भी बच्चों जैसे होते हैं। उन्हें भी उतना ही प्यार चाहिए होता है।
आपको लगता है कि जब मैंने नौकरी करते वक्त बच्चों को नहीं छोड़ा, तो अब छोड़ दूंगा? कंपनी के मालिक अंकल जॉर्ज की तरफ देखकर मुस्कराए और बोले, अगर आप जैसी सोच हर प्रोफेसर में हो, तो हमारे देश को सर्वश्रेष्ठ बनने से कोई नहीं रोक सकता।