हम जितने अधिक कृतज्ञ होते हैं, ईश्वर की उतनी ही अधिक कृपा हमारे जीवन में बहती है। कठिनाई यह है कि हमें जो मिलता है हम उसके प्रति कृतज्ञ होने के बजाय और अधिक की मांग करने लगते है। वह अधिक भले ही गैरजरूरी हो।
दैवी संपदा मडंल के वरिष्ठ कार्यकर्ता डा. वीएन आयंगर ने गीता के एक श्लोक का अध्ययन अनुसंधान करते हुए अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है। ‘प्लेजर विद कंटेनमेंट’ नामक उस रिपोर्ट में भगवदगीता के इस संदेश के सामाजिक और वैयक्तिक अर्थ तलाशने की कोशिश की गई थी जिसमें कहा गया है कि जो मिले उसमें संतुष्ट रहते हुए कृतज्ञ भाव से कर्म करते रहने वाले को प्रभु की कृपा मिलती है।
आयंगर और उनकी टीम के अठारह सदस्यों ने इस विषय में करीब अस्सी लोगों की आर्थिक हैसियत और जीवनदृष्टि का जायजा लिया। रिपोर्ट में आयंगर लिखते हैं कि अपनी उपलब्धियों से असंतुष्ट लोग अक्सर शिकायत और मांग से भरे होते हैं।
अगर आप शिकायत कर रहें हैं, तो आप कृतज्ञ नहीं हो सकते, और अगर आप कृतज्ञ नहीं हैं, तो कृपा कैसे होगी? उनका कहना है कि इस सिलसिले में सबसे पहले तो इस ‘अधिक’ को छोड़ दें। अधिक भक्ति, अधिक कृतज्ञता, अधिक आनंद, अधिक खुशी, हमें इन सबको छोड़ना है, ‘मुझे और अधिक चाहिए’
शिकायत और मांग से भरे लोगों को सलाह देते हुए रिपोर्ट कहती है कि आपको जो भी मिल रहा है, उसके प्रति आप में एक स्तर तक संतोष होना चाहिये, और संतोष के साथ ही कृपा आती है। संतुष्ट रहने का मंत्र बताते हुए आयंगर ने महर्षि रमण की एक शिक्षा गांठ से बांध लेने की सलाह दी है।
कहा है कि यह जानिये, कि यह पूरा जीवन एक स्वप्न की तरह है। यह सब खत्म हो जाएगा और हर एक चीज़ एक दिन नष्ट हो जायेगी। यह सजगता ही आपके अंदर एक परिवर्तन लाएगी।