करीब सभी धर्मो में ध्यान की कुछ न कुछ विधियां प्रचलित हैं। एक कर्मंकांड
मान कर हास तक लोग इस पर ध्यान नहीं देते थे, लेकिन नए जमाने की ‘लाइफ
स्टाइल’ बीमारियों में ध्यान काफी उपयोगी साहित हो रहा है। इस विषय पर हुई
शोधों में कुछ ऐसी बातें उजागार हुई हैं जिनसे पता चलता है कि ध्यान से मन
ही नहीं तन भी दुरुस्त रहता है।
जो दिमाग में कुछ संरचनात्मक बदलाव के कारण
होता हैं। बर्कले यूनिवर्सिटि में इस विषय पर शोध के तहत आठ हफ्ते तक कुछ
लोगों को नियमित रूप से ध्यान कराया गया। शुरू में इन लोगों के दिमाग के
एमआरआई स्कैन किए गए और आठ हफ्ते बाद फिर एमआरआई से जांच की गई।
जांच में पता चला कि ध्यान करने वाले के दिमाग में हिप्पोकैंपस नामक भाग
में ग्रे सेल की संख्या काफी बढ़ गई। हिप्पोकैंपस का संबंध याददाश्त और
सीखने की प्रक्रिया से है। यह भी देखा गया कि तनाव से संबंधित भाग,
जिसे एमाइग्डाला कहते हैं, में ग्रे सेल की संख्या में कमी आ गई थी।
जिन
लोगों ने ध्यान नहीं किया था, उनके दिमाग में ऐसे कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
तीन साल पहले हुई एक अन्य शोध में पता चला था कि ध्यान से लोगों का ब्लड
प्रेशर कम हुआ है। शोधकर्ताओं ने पाया कि जब ध्यान करने वालों ने किसी व्यक्ति को तकलीफ में
देखा, तो उनके दिमाग के टेम्पोरल पेराइटल संधि स्थानों पर सामान्य से
ज्यादा हलचल हुई।
इसका अर्थ यह है कि ध्यान करने वालों में दूसरों के प्रति
संवेदनशीलता और सहानुभूति भी बढ़ जाती है। बर्कले विश्वविद्यालय मे आठ अस्पतालों को भी शोध में शामिल किया और पाया कि
नियमित ध्यान करने वाले मरीज बीमारियों से जल्दी उबरते हैं। वैसे कहा जा
सकता है कि आधुनिक जीवन में तनाव ज्यादा है, लेकिन प्राचीन काल में तो
जीवन ज्यादा कठिन था।
प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा कम थी, चिकित्सा विज्ञान
भी उतना विकसित नहीं था, युद्ध, महामारी आदि के खतरे ज्यादा थे। असुरक्षा
और अनिश्चितता तब ज्यादा थी, लेकिन तब मनुष्य ने अपने अंदर झांककर अपनी
आत्मा में शांति और ठहराव का सतत झरना खोजा।