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इस घटना को पढ़कर धन से मोह भंग हो सकता है आपका

Mon, 03 Feb 2014 01:23 PM IST
अध्यात्मिक गुरू/ सुधांशु जी महाराज
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एक बार किसी गांव में महात्मा बुद्घ का सत्संग हुआ। सब इस होड़ में लग गए कि क्या भेंट करें। इधर सुदास नाम का एक मोची था। उसने देखा की मेरे घर के बाहर के तालाब में बे मौसम का एक कमल खिला है।
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उसकी इच्छा हुई कि आज नगर में महात्मा बुद्घ आए हैं। सब लोग तो उधर ही गए हैं, आज हमारा काम चला नहीं, तो आज यह फूल बेचकर गुजारा कर लेंगे। वह तालाब के अंदर कीचड़ में घुस गया।

कमल के फूल को लेकर आया केले के पत्ते का दोना बनाया और उसके अंदर कमल का फूल रख दिया। पानी की कुछ बूंदे कमल पर पड़ी हुई थी सो वह बहुत सुन्दर दिखाई दे रहा था।
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इतनी देर में एक सेठ पास आया और बोला ‘‘क्यों फूल बेचने की इच्छा है?’’ आज हम आपको इसके दो चांदी के रुपये दे सकते हैं। अब उसने सोचा एक दो आने का फूल। इसके दो रुपये दिये जा रहे हैं। वह आश्चर्य में पड़ गया।

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इतनी देर में नगर सेठ आया। उसने कहा ‘‘भाई! फूल बहुत अच्छा है, यह फूल हमें दे दो।’’ हम इसके दस चांदी के सिक्के दे सकते हैं। मोची ने सोचा इतना कीमती है यह फूल नगर सेठ ने मोची को सोच में पड़े देखकर कहा अगर पैसे कम हों तो ज्यादा दिए जा सकते हैं।

मोची ने सोचा-क्या बहुत कीमती है यह पूफल? नगर सेठ ने कहा- मेरी इच्छा है कि मैं महात्मा बुद्घ के चरणों में यह फूल रखूं। इसलिए इसकी इतनी कीमत लगाने लगा हूं। इतनी देर में उस राज्य का मंत्री अपने वाहन पर बैठा हुआ पास आ गया और कहने लगा- क्या बात है? कैसी भीड़ लगी हुई, अब लोग कुछ बताते उससे पहले उसका ध्यान उस फूल की तरफ गया।

उसने पूछा- यह फूल बेचोगे? हम इसके सौ सिक्के दे सकते हैं। क्योंकि महात्मा बुद्घ आए हुए हैं। ये सिक्के तो कोई कीमत नहीं रखते। जब हम यह फूल लेकर जाएंगे तो सारे गांव में तो चर्चा होगी की महात्मा बुद्घ ने केवल मंत्री का ही फूल स्वीकार किया। हमारी बहुत ज्यादा चर्चा होगी।

इसलिए हमारी इच्छा है कि यह फूल हम भेंट करें और कहते हैं कि थोड़ी देर के बाद राजा ने भीड़ को देखा, देखने के बाद वजीर से पूछा कि क्या बात है? वजीर ने बताया कि ‘‘फूल का सौदा चल रहा है।’’

राजा ने देखते ही कहा इसको हमारी तरफ से एक हजार चांदी के सिक्के भेंट करना। ‘‘यह फूल हम लेना चाहते हैं’’ सुदास ने कहा‘‘लोगे तो तभी जब हम बेचेंगे। हम बेचना ही नहीं चाहते।’’

अब राजा कहता है कि बेचोगे क्यों नहीं’’ सुदास ने कहा कि जब महात्मा बुद्घ के चरणों में सब लोग कुछ भेंट करने के लिए पहुंच रहें हैं तो ये फूल इस गरीब की तरफ से आज उनके चरणों में भेंट होगा। राजा बोला ‘‘देख लो, एक हजार चांदी के सिक्कों से तुम्हारी पीढि़यां तर सकती हैं।’’

मोची ने कहा- ‘‘मैंने तो आज तक राजाओं की संपत्ति से किसी को तरते नहीं देखा, लेकिन महान पुरुषों के आशीर्वाद से तो लोगों को जरुर तरते देखा है। राजा मुस्कुराया और कह उठा - तेरी बात में दम है।

तेरी मर्जी तू ही भेंट कर ले। अब राजा तो उस उद्यान में चला गया जहां महात्मा बुद्घ ठहरे हुए थे और बहुत जल्दी चर्चा महात्मा बुद्घ के कानों तक भी पहुंच गई कि आज कोई आदमी फूल लेकर आ रहा है जिसकी कीमत बहुत लगी है।

वह गरीब आदमी है। इसलिए फूल बेचने निकला था, जिससे उसका गुजारा होता। जैसे ही सुदास फूल लेकर पहुंचा, तो शिष्यों ने महात्मा बुद्घ से कहा कि सुदास आ गया है। लोग एकदम सामने से हट गए। महात्मा बुद्घ ने उसकी तरफ देखा सुदास फूल लेकर जैसे ही पहुंचा तो उसकी आंखों में आंसू बरसने लगे।

कुछ बूंद तो पानी की कमल पर पहले ही थी, कुछ बूंदे उसके आंसुओं के रूप में ठिठक गईं उस कमल पर। रोते हुए उसने कहा। ‘‘सबने बहुत-बहुत कीमती चीजें आपके चरणों में भेंट की होंगी। लेकिन इस गरीब के पास यह कमल का फूल और जन्म-जन्मान्तरों के पाप जो मैंने किए हैं, उनके आंसू आंखों मे भरे पड़े हैं। आज आपके चरणों में चढ़ाने आया हूं। मेरे ये फूल और मेरे आंसू भी स्वीकार करें।

महात्मा बुद्घ के चरणों में फूल रख दिया। सुदास घुटनों के बल बैठ गया। महात्मा बुद्घ ने अपने शिष्य आनन्द को बुलाया और कहा, ‘‘देख रहे हो आनन्द! हजारों साल में भी कोई राजा इतना नहीं कमा पाया जितना इस गरीब सुदास ने आज एक पल में ही कमा लिया। इसका पुण्य श्रेष्ठ हो गया।

आज राजाओं के मुकुट हार गए, गरीब का फूल जीत गया। इसे केवल एक फूल न समझना, इसमें श्रद्घा का खजाना छिपा पड़ा है।’’ कहते हैं उसके बाद सुदास घर नहीं आया। उसने महात्मा बुद्घ से इतना ही कहा, ‘‘बरसों से आपके दर्शन करना चाहता था लेकिन आध-अधूरा मन लेकर नहीं।

आज आया हूं तो पूरा मन लेकर आया हूं और आज आया हूं तो फिर लौटूंगा नहीं। आज से तन भी आपका, मन भी आपका स्वरुप भी आपका, सब कुछ आपका। उसके बाद वह भिक्षु बन गया। साधु बन गया और उसी दिन से उसकी साध्ना सिद्घ होने लगी।
    
‘‘इस कथा का सार यह है धन साधन है साध्य नहीं। यह मंजिल तक पहुंचने के लिए वाहन है लेकिन मंजिल नहीं। धन आपको यंत्र दे सकता है संगीत नहीं। मकान दे सकता है, आराम नहीं। नौकर दे सकता है, पर वफादार सेवक नहीं। इसलिए धन को मंजिल पर पहुंचने का साधन तो बनाओ। पर, धन को ही मंजिल मानकर मत बैठ जाओ।’’
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