रीमा अमरावती के एक छोटे-से अस्पताल में नर्स का काम करती थी। उसे लोगों की सेवा करना अच्छा लगता था। एक दिन अस्पताल में एक नौजवान लड़का अपना इलाज कराने आया। वह अपने मां-बाप का इकलौता लड़का था। डॉक्टर साहब ने उसे कुछ जांच बताईं और उससे तुरंत भर्ती होने को कहा। रीमा जानती थी कि डॉक्टर साहब मरीजों को ठीक करने के लिए सब कुछ दांव पर लगा देते थे। इसी कारण देश के नामी डॉक्टर तक डॉक्टर साहब की बेहद इज्जत करते थे। उस नौजवान की हालत गंभीर होती जा रही थी।
रीमा को पता चला कि उसे कैंसर है और शायद उसका बचना मुश्किल है। डॉक्टर साहब ने मुंबई से एक बड़े कैंसर सर्जन डॉ. अग्रवाल को उस नौजवान के इलाज के लिए बुलाया। जब डॉ. अग्रवाल को पता चला कि सारा खर्च डॉक्टर साहब खुद उठा रहे हैं, तो उनके मन में डॉक्टर साहब के प्रति इज्जत और बढ़ गई। वह हर हफ्ते अपने खर्चे पर नौजवान का इलाज करने मुंबई से अमरावती आने लगे। डॉ. अग्रवाल के आते ही अस्पताल का माहौल एकदम खुशनुमा हो जाता था। उस नौजवान की भी हालत पहले से काफी बेहतर हो चुकी थी।
एक दिन उसने डॉ. अग्रवाल से पूछा, डॉक्टर, मैं ठीक तो हो जाऊंगा न। डॉक्टर ठहाका मारकर हंसे और बोले, तुम्हें हुआ ही क्या है? बस अब घर जाने की तैयारी करो। जब डॉ. अग्रवाल कमरे से निकले, तो रीमा ने उनसे पूछा, डॉक्टर, क्या सच में वह घर जाने वाला है? क्या वह ठीक हो गया? डॉक्टर बोले, उसकी बीमारी का इलाज तो नहीं है। पर हम अच्छा सोचेंगे, तभी तो अच्छा कर पाएंगे। क्या पता, हमारी सोच से ही कुछ चमत्कार हो जाए। हालांकि उस नौजवान की तीन साल बाद मौत हो गई, पर रीमा ने देखा कि डॉ. अग्रवाल की सोच बहुत कारगर रही। उस नौजवान की जिंदगी तीन साल पहले ही खत्म हो गई होती। लेकिन उसके जीवन के आखिरी तीन साल बेहतरीन और मस्ती भरे तीन साल रहे।