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जिसकी बुद्घिमानी और साहस से यमराज ने माना हार

Fri, 07 Jun 2013 03:40 PM IST
श्री अरविंद
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सावित्री शब्द ‘सवितृ’ से बना है। इसमें ‘सु’ धातु है जिसका अर्थ है, उत्पन्न करना। सोम शब्द भी ‘सु’ धातु से बना है जिसका अर्थ है उत्साहवर्धन प्रेम अथवा आत्मिक आनन्द। इस प्रकार सावित्री का अर्थ है-सर्जक, सृष्टि को उत्पन्न करने वाला। वेदों में सविता प्रकाश ओर सृजन का देवता है।
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उसका पार्थिव प्रतीक हमारा सूर्य है जो समस्त सौरजगत को पोषित करता है। इस प्रकार ‘सावित्री’ का अर्थ होगा-साविता की पुत्री अथवा दैवी सर्जक की शक्ति। श्री अरविंद के अनुसार वेदों में अश्व जीवनी शक्ति का द्योतक है, अतः अश्वपति का अर्थ जीवन का स्वामी ही हो सकता है।

‘सावित्री में राजा अश्वपति पृथ्वी पर अवतरित जिज्ञासु आत्मा का प्रतीक है। यह कथा महाभारत में अरण्य पर्व के एक अंश पर आधारित है। महकाव्य में श्री अरविन्द ने कथा ज्यों की त्यों रखी है, केवल उसे प्रतीकात्मक बना दिया है।
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अश्वपति का चरित्र विश्व-सृजन संबंधी मान्यता का प्रतीक है।  अश्वपति की तपस्या को कवि ने आत्मज्ञान और विश्वज्ञान की प्राप्ति के लिए जिज्ञासु मानवता की खोज के रूप में चित्रित किया गया है। यह अश्वपति विश्व के विभिन्न स्तरों से ऊपर उठते हुए उच्चतर मानस तथा उच्च ज्ञान के स्तर तक पहुँच जाता है। उसके हदय में जिज्ञासा की अग्नि प्रज्ज्वलित है। अश्वपति इस पृथ्वी पर सतयुग लाना चाहते हैं।

मानव चेतना कितना महान ज्ञान अर्जित कर सकती है, वह कितनी गहराई और ऊँचाई तक जा सकती है, यह अश्वपति की तपस्या से प्रकट होता है। दैवी शक्ति से वरदान प्राप्त होता है कि उसकी कृपा

पृथ्वी पर अवतरित होगी। इस प्रकार सावित्री का पृथ्वी पर जन्म होता है। सन्तान-कामना की एक सामान्य कथा को श्रीअरविन्द ने यह दिव्य रूप दिया है। अश्वपति की यात्रा अचेतन से चेतन के उच्च स्तर पर पहुँचने की यात्रा है। सावित्री भी केवल महाभारत की एक सामान्य राजकुमारी न रहकर दिव्य कृपा की अवतार बन जाती है।

वह मानव के दुःखों और अपमानों को सहकर अन्धता और मृत्यु पर विजय प्राप्त कर दिव्यलोक की प्राप्ति करती है। वह यमराज का सामना कर अपने पति सत्यवान को मृत्युपाश से छुड़ाती है। अपनी अमरता और अनंतता के विस्तार से ही वह यह विजय प्राप्त करती है।
 
सावित्री का जन्म, बाल्यकाल, पति के वरण की उसकी यात्रा, सत्यवान से मिलन वापस आने पर नारद से मिलन आदि कथाएं ज्यों की त्यों रखी गई हैं। अन्तर इतना ही है कि श्री अरविन्द की सावित्री अपनी मनुष्यता के साथ अपनी दिव्यता का भी एक साथ अनुभव करती है।

नारद-सावित्री-संवाद में कवि ने विश्वनियन्ता का उद्देश्य तथा मानव के अदृश्य और कर्म सिद्धान्त को उच्च शिखर पर पहुँचा दिया है। सावित्री के आरंभिक पर्वों में दैवी माता द्वारा दिए गए वरदान की महत्ता प्रदर्शित की गई है। यम-सावित्री केवल मानव-जाति की प्रतिनिधि नहीं है। अपितु दैवी कृपा की भी अवतार है।

यम कुटिलता, प्रलोभन, छल आदि को रचने वाले अज्ञान का प्रतिनिधि है। सारा संवाद उच्च के उच्चतर स्तर पर उठता चला जाता है। उसमें अतिमानस क्षेत्र की ज्योति और आत्मप्रेरणा की चमक बीच-बीच में कौंध जाती है। ‘सावित्री’ महाकाव्य में उसमें मनोवैज्ञानिक तथ्य भरे हुए हैं, जिससे मानव-विकास हो सकता है।

मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सावित्री का प्राचीन कथानक समाप्त हो जाता है। किंतु श्री अरविन्द की ‘सावित्री’ में वे दोनों मृत्यु का राज्य पार कर अन्नत दिवस के राज्य में प्रवेश करते हैं जहाँ कि सत्य का सूर्य कभी अस्त नहीं होता, जहाँ अज्ञान और मृत्यु का कोई स्थान नहीं है।

वहाँ कुछ काल ठहरकर वे दोनों पृथ्वी की ओर देखते हैं दैवी कार्य पूर्ण करने के लिए लौट पड़ते हैं- वह कार्य है नवीन मानवता का सृजन। यही ‘सावित्री’ की सबसे बड़ी विशेषता है। सावित्री महाकाव्य का आरंभ उषःकाल के रूपक से प्रारम्भ होता है।

उसमें आत्मा प्रकृति में प्रवेश करती है, जैसे अन्ध रजनी के बाद सूर्य का उदय होता है। सिद्धि के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचकर वह पृथ्वी पर उतरते हैं। उनको आदेश मिलता है कि वे मनुष्य जाति की पूर्णता के लिए प्रयत्न करें। इस प्रयत्न में उन्हें दैवी कृपा की सहायता मिलेगी जिससे मनुष्य की समस्या हल होगी।

महाकाव्य का मूल संदेश है तमस पर सत्व की विजय, अमृतत्व से मृत्यु का पराभव और शाश्वत चेतना का उदय। सावित्री अर्थात सर्जक परमात्मा की शक्ति. सत्य का वरण करती है तो मृत्यु के देवता भी उसके नियमों और विधानों को नहीं समझ पाते। अंततः उन्हें शाश्वत चेतना के नियमों को स्वीकार करना पड़ता है।
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