खुशी आनंद की ऐसी अनुभूति है जब हम किसी तरह के दु:ख-दर्द का अनुभव नहीं कर रहे हों। इस परिभाषा के साथ चलेंगे तो खुशी बहुत उथला और अयथार्थ भाव है। प्रसन्न भाव बहुत से बाहरी तत्वों पर निर्भर करता है। पहली बात तो यह कि जीवन में कुछ भी नियत नहीं है और दु:ख-दर्द कभी भी सर उठा सकते हैं।
कोई ईश्वर न हो तो भी हमारे भीतर आत्मा जैसा कुछ है, जिसे कुछ विधियों के कठोर अभ्यास से देखा या अनुभव किया जा सकता है। सिर्फ मन की शांति ही वह चीज है, जिसे हम चाहें तो आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। वास्तविकता में घट रही घटनाओं को साक्षी भाव से देखने से हमारे मानस और काया को शांति मिलती है।
भले ही यह श्रमसाध्य और अप्रीतिकर हो, यह हमें उस दशा में ले जाता है जिसमें द्वैत नहीं होता। आप इसे आनंद भी कह सकते हैं पर इसमें कोई हिलोर नहीं है। जीवन अनुभवों की सतत धारा है। आप इसमें बहकर डूब भी सकते हैं और इसके विपरीत तैरने की जद्दोजहद में स्वयं को नष्ट भी कर सकते हैं।
दोनों ही स्थितियों में आपका मिटना तय है। यदि आप इसे केवल बहते हुए देखेंगे तो सुरक्षित रहेंगे। तब आपके भीतर मौलिक बोध उपजेगा, सभी वस्तुओं को खंड-खंड उनके परिदृश्य में देख पाएँगे। आवश्यकता सिर्फ दर्शक बनने की है, न नाटक का निर्देशन करना है और न ही उसमें कूद पड़ना है।