हमारा अस्तित्व पूरे विश्व से अलग नहीं है। हालांकि यह विचार सुनने में आध्यात्मिक लगता है, पर यदि हम वैश्विक व सामाजिक स्थिति पर नजर डालें तो यह विचार बहुत तर्कसंगत है। यदि हमारे पड़ोस में आग लगी हो और हम समय पर कुछ उपाय न करें तो हो सकता है कि वह आग हमारे घर तक भी शीघ्र ही पहुंच जाए।
कई प्राचीन संस्कतियों में यह विचार है कि यह पूरी दुनिया एक ही जीव है। सूक्ष्म जगत इस पूरे ब्रहांड का ही प्रतीक है। जैसे हमारे संपूर्ण अस्तिव में स्वछंद रूप से लाखों करोड़ों सेल हैं उसी प्रकार यह संपूर्ण ब्रहांड भी एक जीव की ही भांति हैं जिसमें अनेकों जीव आजाद होकर भ्रमण करते हैं।
आज के परिप्रेक्ष्य में विचार करने पर हम पाते हैं कि संसार के विभिन्न क्षेत्र धर्म, क्षेत्रवाद, अलगाव, आतंकवाद की आग में जल रहे हैं। सीरिया और इजिप्ट जैसी कई जगहों पर अलगाववादी विचार के लोगों को बल व शस्त्र के प्रयोग से खत्म किया गया है।
हालांकि चरम अवस्था में बल प्रयोग करने में कोई बुराई नहीं हैं परंतु यदि रोजाना इसका इस्तेमाल किया जाए तो यह लम्बे समय में हमारे स्वयं के लिए ही हानिकारक सिद्ध होगा। जैसे बीमारी का ईलाज करने की अपेक्षा शरीर को स्वस्थ व स्वच्छ रखना ज्यादा अच्छा है वैसे ही शस्त्र व बल प्रयोग की अपेक्षा शांति, भाईचारा व सौहार्द बनाए रखना ज्यादा बेहतर है।
धार्मिक कटटरता से बच्चों व समाज को बचाए रखने के लिए आवश्यक है कि उन्हें एक स्वस्थ बहु-सांस्कतिक समाज के बारे में विस्तार से बताया जाए। वहीं दूसरी तरफ नौजवानों में सेवा की भावना पैदा करके हम भ्रष्टाचार जैसी बुराई पर भी अंकुश लगा सकते हैं।
इसलिए समस्त विश्व में शांति के लिए मानवीय मूल्यों व भिन्नता पर आधारित शिक्षा का होना अति आवश्यक है। पूरे विश्व की आबादी के केवल कुछ ही लोग भय व आतंक को बढ़ावा देते हैं। पूरे विश्व की सात अरब जनसंख्या में केवल कुछ हजार लोग ही ऐसे हैं जो अपराध को बढ़ावा देते हैं और उन्हीं की वजह से संपूर्ण विश्व पर इसका असर पड़ता है।
बिल्कुल इसी तरह विपरीत स्थिति भी लागू होती है। संसार के कुछ हजार लोग शांति, प्रेम, भाईचारे व सौहार्द के बल पर पूरे विश्व में शांति ला सकते हैं। क्या हम ऐसा नहीं कर सकते? इसलिए कभी भी यह नहीं सोचना चाहिए कि मैं अकेला विश्व में शांति के लिए क्या कर सकता हूं।
इस पूरी दुनिया में शांति लाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति का अपना अपना किरदार है। जैसे एक छोटी सी होम्योपैथी की गोली में भारी भरकम शरीर वाले लोगों को ठीक करने की क्षमता होती है वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति का इस ब्रह्मांड पर प्रभाव पड़ता है।
जब हम शांति व प्रेम रूपी किरणों को बिखेरते हैं तो वे अपना प्रभाव जरूर डालते हैं। हममें से जिन्हें भी अपने जीवन में आंतरिक शांति व सुख प्राप्त हुआ है, उन सभी के सामने शांति व प्रेम को दूसरों तक पहुंचाने की चुनौती है। बल्कि हमारा लक्ष्य संसार के प्रत्येक क्षेत्र, जहां भी तनाव व अशांति की स्थिति है वहां पर प्रेम, शांति व भाईचारे के संदेश को पहुंचाना है।
संपूर्ण संसार एक है कि भावना ही हमें अपने छोटेपन से निकालने में मददगार साबित होगी। पूरे संसार के प्रति बड़ा दष्टिकोण, भिन्नता में एकता की समझ व मानवीय मूल्यों का रखरखाव ही शांति की दिशा में पहला कदम हो सकता है।
साभार: आर्ट ऑफ लिविंग
श्री श्री रविशंकर परिचय
मानवीय मूल्यवादी, शांतिदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया।
महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।