हम अपनी मुस्कान क्यों खो बैठते है? इसका एक ही कारण है कि हम तृष्णा, घृणा और माया के चक्कर में उलझ जाते हैं। "यह ठीक नहीं है- वो ठीक नहीं है... अमुक आदमी अच्छा नहीं ..."आदि नकारात्मक विचारो में उलझ कर अपनी सारी सकारात्मक ऊर्जा नष्ट कर देता हैं। इस स्थिति में तुम कुछ भी करने में सक्षम नहीं रह जाते, अपने प्रेम, मुस्कान और उत्साह को खो देते हो।
असल में माया किसी को भी अपने जाल में फंसा लेती है और अपनी धुन में नाच नचाती रहती है। आज सारा संसार माया की पकड़ में फंसकर परेशान है। इसलिए अनेक लोग माया की आलोचना करते है और माया से घृणा करते है। पर भगवान् कृष्ण कहते हैं- "माया मुझ से ही उत्पन्न हुई है तथा उसमें अनेक गुण विद्यमान है अत: तुम्हे माया का सम्मान करना चाहिए।"
यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी सिनेमा का निर्देशक कह सकता है कि नायक और खलनायक दोनों उसके है, सिनेमा के नायक के लिए खलनायक खलनायक है पर निर्देशक पूरे अधिकार के साथ यह कह सकता है कि दोनों उसके अपने है, उसने ही दोनों को अलग अलग भूमिका निभाने के लिए अनुबंधित किया है। अत: फिल्म में जो कुछ भी हुआ है उसका लेखन और सृजनकर्ता वही है।
इसी प्रकार, भगवान कृष्णा कहते हैं कि" यह माया मुझ से ही उत्त्पन्न हुई है और मैं ही इसका प्रसार करता हूं। तुम चाहे कितना भी प्रयास करो, केवल प्रयास से इससे मुक्त नहीं हो सकते। केवल मेरी दिव्य कृपा से ही तुम इससे बच सकते हो। सिर्फ और सिर्फ मुझमें शरण लेकर ही तुम माया रुपी भवसागर के पार जा सकते हो।
श्री श्री रविशंकर परिचय
मानवीय मूल्यवादी, शांतिदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया।
महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।