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आत्मा की चाहत है विश्रामः श्री श्री रविशंकर

Tue, 28 May 2013 12:10 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
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क्या ध्यान हमारे लिए कुछ नयी सी अनोखी सी बात है? बिलकुल नहीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि जन्म लेने से कुछ महीने पहले आप ध्यान में ही थे। आप माँ के गर्भ में थे; कुछ नहीं कर रहे थे, आपको अपना खाना भी नहीं चबाना होता था। वह सीधे पेट में पहुंच रहा था, और आप प्रसन्नता से एक द्रव में तैर रहे थे, पलटियां खाते हुए, लात मारते हुए, कभी यहाँ और कभी वहाँ, लेकिन ज़्यादातर समय आप सिर्फ प्रसन्नता से तैर रहे थे, ये ध्यान है।
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आप कुछ नहीं करते, सब कुछ तुम्हारे लिए किया जाता है। तो ये हर इन्सान की प्रकृति है, हर आत्मा की प्यास उस स्थिति में रहने की होती है जहाँ वो पूर्ण रूप से विश्राम में हो। पता है आप विश्राम क्यों चाहते हो? क्योंकि एक समय आप उस विश्राम में रह चुके हो, इसलिए फिर उस विश्राम की चाह प्राकृतिक है जिसका आप कभी एक समय में अनुभव कर चुके हो। ध्यान पूर्ण विश्राम है।

इसलिए वापस उस स्थिति में जाना जिसका स्वाद आप इस दुनिया की अफरा तफरी में आने से पहले ही चख चुके हो, एकदम प्राकृतिक है क्योंकि इस ब्रह्माण्ड में सब कुछ चक्रीय है, सब कुछ वापस अपने मूल की ओर जाना चाहता है ओर ये संसार की प्रकृति है। सब कुछ एक चक्र के जैसे चलता है, वापस जाता है सिवाय प्लास्टिक के अगर आप उसको ठीक से इस्तेमाल नहीं करते हो तो।
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देखो जब पतझड़ का मौसम आता है तो पत्तियां झड़ जाती हैं और वापस धरती में, मिट्टी में मिल जाती हैं। प्रकृति का अपना एक तरीका है उन्हें वापस यहाँ भेजने का। प्रकृति की अपनी एक प्रवृत्ति है उन सबको पुनः चक्रीय करने की। जो भी रोज़-रोज़ इकठ्ठा करते हैं जैसे कि विचार, संस्करण आदि।

उन से छुटकारा पाना और फिर अपनी असली स्थिति में आना, उसी स्थिति में जिस में हम इस ग्रह में आये थे, ये ध्यान है। शांति जो हमारा असली स्वरुप है उसमें वापस जाना ध्यान है, पूर्ण ख़ुशी और आनंद ही ध्यान है।

एक ऐसी ख़ुशी जिसमें से उत्तेजना निकल जाए वो ध्यान है, बिना फिक्र का रोमांच ध्यान है। बिना नफरत या किसी और नकारात्मक सोच का प्यार ध्यान है, ध्यान आत्मा के लिए भोजन जैसा है। खाने की भूख नैसर्गिक है ना। जब आप भूखे होते हो तब आपको उसी वक़्त कुछ खाने को चाहिए, आप प्यासे हो तो पीने को पानी चाहिए। उसी तरह आत्मा को ध्यान की तड़प उठती है और ये सब की फितरत है।

इसलिए ही मैं कहता हूँ की इस धरती पर ऐसा कोई भी नहीं जो अन्वेषक ना हो, खोजी ना हो, बस उनको पता नहीं है, वो इस बात को पहचानते नहीं हैं। वो खाना वहाँ ढूँढ़ते हैं जहाँ वो उपलब्ध नहीं, बस यही समस्या है। ये ऐसा ही है कि आपको अपनी कार में गैस भरवानी हो और आप किराने की दुकान पर जाओ, और वहाँ जाकर दुकान के इर्द गिर्द बस घूमते ही रहो और कहते रहो कि मुझे अपनी कार में गैस भरवानी है।

लेकिन ऐसा करने से होगा कुछ भी नहीं क्योंकि आपको गैस भरवाने के लिए पेट्रोल स्टेशन ही जाना होगा। इसलिए सही दिशा ढूँढने की ज़रूरत है और वही तो अभी हम कर रहे हैं। ध्यान करने के कौन से रास्ते और तरीके हैं, जिनसे हम अपने अन्दर पूर्ण विश्राम का अनुभव कर सकते हैं। ध्यान करते समय मन शांत हो जाता है पर कई साधक मन से आगे नहीं जा पाते। जबकि जरूरी है कि मन से आगे जाने का प्रयत्न हो।

इसका उपाय है कि सिर्फ अपने लिए कुछ प्रयत्न मत कीजिये। सब कुछ स्वाभाविक रूप से होने दीजिए। यदि आप मालिश कराने के लिए जाते हैं, तो आप क्या करते हैं? आप बस मालिश वाले को आपका ख्याल रखने देते हैं। मालिश करने वाला अपना काम करता है और आप कुछ नहीं करते| उसी प्रकार, ध्यान में भी, सृष्टि को आपका ख्याल रखने दीजिए; आपकी आत्मा को सब करने दीजिए।
 
आपका अत्यंत प्रयत्न करना ही सबसे बड़ी रूकावट है। आप बस विश्राम करें और आप स्वयं ही संवेदनशील हो जायेंगे। आपकी खुश रहने की कोशिश ही खुशी में एक बड़ी रुकावट है। प्रयत्न सांसारिक दुनिया का शब्द है। यदि आप प्रयत्न नहीं करेंगे, तो आप धन नहीं कमा सकते, पढ़ नहीं सकते, परीक्षा में अच्छे अंक नहीं ला सकते। आप उपाधि नहीं पा सकते यदि आप प्रयत्न नहीं करें। इस लिए, हर सांसारिक कार्य या वस्तु के लिए आपको प्रयत्न करना है।

घर बनाने के लिए प्रयत्न करना है। बस बैठे-बैठे सोचने से घर नहीं बनेगा। पर कुछ अध्यात्मिक पाने के लिए एकदम विपरीत प्रक्रिया की आवश्यकता है; कोई प्रयत्न नहीं। कुछ क्षण बस बैठने की और कुछ भी ना करने की। मुझे पता है, आप कहोगे कुछ भी न करना तो बहुत कठिन है। मौन रहना कठिन है। पर यह अपने आप हो जाता है| कुछ दिन यहाँ या वहां, और आप देखोगे यह कितना आसान है, सहज है।
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