होली रंगों का
त्योहार है। यह संसार कितना रंग भरा है। प्रकृति की तरह ही हमारी भावनाओं तथा
संवेदनाओं का रंगों से संबंध है। क्रोध का लाल, ईर्ष्या का हरा, आनंद और
जीवंतता के लिए पीला, प्रेम का गुलाबी, नीला विस्तार के लिए, शांति के लिए श्वेत,
त्याग का केसरिया और ज्ञान का जामुनी।
प्रत्येक मनुष्य रंगों का एक फव्वारा है जो
बदलते रहते हैं। पुराण अनेक सुन्दर उदाहरणों एवं कथाओं से युक्त है और यहां
होली की एक कहानी है। राजा हिरण्यकश्यप चाहता था कि सभी उसकी पूजा करें।
किन्तु उसका पुत्र प्रह्लाद भक्त था भगवान विष्णु का, जिनका वह राजा कट्टर
शत्रु था।
क्रोधित राजा चाहता था कि उसकी बहन होलिका, प्रह्लाद से छुटकारा दिलाये।
अग्नि को सहन करने कि शक्ति से युक्त होलिका, प्रह्लाद को गोद में लेकर
अग्नि के कुण्ड में बैठ गयी। लेकिन, होलिका जल गयी। प्रह्लाद सुरक्षित रहा।
हिरण्यकश्यप स्थूलता का प्रतीक है। प्रह्लाद भोलपन, श्रद्धा एवं आनंद की
प्रतिमूर्ति है। चेतना को केवल भौतिकता के प्रेम तक ही सीमित नहीं रखा जा
सकता। हिरण्यकश्यप चाहता था कि संपूर्ण आनंद भौतिक संसार से ही प्राप्त हो,
लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
जीवात्मा सदैव सांसारिक वस्तुओं के बन्धन में नहीं रह
सकती। स्वभावतः वह 'नारायण', अपने उच्च स्वयं, की ओर अग्रसित होगी ही।
होलिका भूतकाल की बोझिलता की प्रतिनिधि है, जो प्रह्लाद के भोलेपन को नष्ट
करने के लिए प्रतिबद्ध है।
किन्तु प्रह्लाद नारायण की भक्ति में इतनी
गहराई में स्थित है कि, अपने सभी पुराने संस्कारों को, प्रभावों को, मिटा देता है
और आनंद खिल उठता है नये रंगों के साथ!
जीवन एक उत्सव बन जाता है। भूत की
छाप को मिटाकर आप नई शुरूआत के लिए उद्धत होते हैं। आपकी भावनाएं अग्नि की
तरह आपको जलाती हैं। किन्तु जब वह रंगों की फुहार सी हों, तो आप के जीवन में रंग भर
देती है।
अज्ञानता में भावनाएं कष्टकारी हैं, ज्ञान में यही भावनाएं जीवन
के भिन्न रंग हैं। होली की तरह ही जीवन भी रंगों से भरा होना चाहिए न कि उबाऊ।
जब सभी रंग स्पष्ट देखे जाएं तब वह रंग भरा है, जब सभी रंग घुल जाते हैं,
वह हो जाता है- "काला"। जीवन में हम विभिन्न भूमिकाएं निभाते हैं। प्रत्येक
भूमिका एवं भावना स्पष्ट रूप से परिभाषित होनी चाहिए। अस्पष्ट भावनाएं कष्ट उत्पन्न
करती हैं।
जब आप एक पिता हैं, आपको पिता का पात्र निभाना है। कार्यस्थल पर
आप पिता नहीं हो सकते! जब आप जीवन की विभिन्न भूमिकाओं को मिश्रित करते हैं
तब आप से गलतियां होनी शुरू होती हैं। आप अपने जीवन में जो भी पात्र निभा
रहे हैं पूर्ण रूप से उस ही में हों।
विविधता में समन्वयता जीवन को अधिक जीवंत एवं
रंग भरा बनाती है। जीवन में आप आनंद का जो भी अनुभव करते हैं वह आपको स्वयं
से ही प्राप्त होता है- जब आप वह सभी छोड़कर शांत हो जाते हैं, जिसे आपने जकड़ा हुआ
है। यह भी ध्यान कहलाता है।
ध्यान कोई क्रिया नहीं है यह कुछ भी नहीं करने
की कला है। ध्यान में आप को गहरी नींद से भी अधिक विश्राम मिलता है क्योंकि आप सभी
ईच्छाओं के पार होते हैं। यह मस्तिष्क को गहरी शीतलता देता है। यह मस्तिष्क
शरीर तंत्र को पुनर्जीवन देने के समान है।
उत्सव चेना का स्वभाव है, तथा वह
उत्सव जो मौन से उत्पन्न होता है वह ही वास्तविक है। यदि उत्सव के साथ
पवित्रता को जोड़ दिया जाए तो वह पूर्ण हो जाता है। केवल शरीर तथा मन ही उत्सव नहीं
मनाता बल्कि चेतन भी उत्सव मनाती है, तथा उस स्थिति में जीवन रंग युक्त हो जाता
है।