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आप भी जान लीजिए कृष्ण के जन्म लेने का असली रहस्य

Sat, 05 Sep 2015 01:33 PM IST
श्री श्री रविशंकर/अध्यात्मिक गुरु
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जन्माष्टमी कृष्ण के जन्म का उत्सव है। अष्टमी का आधा चांद महत्वपूर्ण है, वह सत्य के प्रकट और अप्रकट पहलुओं के बीच एक पूर्ण संतुलन का द्योतक है। दिखने वाले भौतिक जगत और न दिखने वाले आध्यात्मिक जगत के बीच में। कृष्ण का ज्ञान हमारे समय के लिए सबसे अधिक प्रासंगिक है क्योंकि न ही वह भौतिक सुखों को बटोरने में आपको खोने देता है और न आपको सब कुछ त्यागने देता है। कृष्ण का अर्थ है सबसे आकर्षक कृष्ण हर जीव की आत्मा है।
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कृष्ण मक्खन चोरी करते थे। इस रूपक का क्या अभिप्राय है? मक्खन एक प्रक्रिया का अंतिम उत्पाद है। पहले दूध को दही बनाया जाता है और फिर उसे मथ कर मक्खन बनाया जाता है। और दूध या दही की तरह जीवन का भी मंथन बहुत सारी घटनाओं, परिस्थितियों और उतार-चढ़ाव के द्वारा होता है। अंत में मक्खन बाहर निकलता है। वह आपका संतत्व है।

इस सबका सार है संतुलन बनाए रखना, आनंदित, खुश और केंद्रित रहना। जब सब कुछ जीवन में ठीक है तब एक बड़ी मुस्कान रखना आसान है। यदि आप प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मुस्कुरा सकते हैं तब आपने जीवन में सच में कुछ पाया है। कृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा कुछ ऐसी ही है –उनका एक पांव पृथ्वी पर मज़बूती से जमा हुआ है, लेकिन संतुलित है, ऐसे ही नृत्य हो सकता है।
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यह संतुलित जीवन जीने के सही तरीके को दर्शाता है। भगवद् गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं, ‘ऐसा क्यों है कि इतने सारे लोग मेरे बारे में जानने में सक्षम नहीं हैं? दरअसल वे अपने राग और द्वेष के बीच फंसे हुए हैं।’

कृष्ण कहते पुण्य फलित होने से लोग दु:ख से मुक्त हो जाते हैं। जिनके पाप कर्म शुद्ध नहीं हुए हैं वे अज्ञान और भ्रम में फंसे रहते हैं।’कृष्ण सभी संभावनाओं के प्रतीक हैं, जन्माष्टमी का दिन है कृष्ण के उस विराट स्वरुप को अपनी चेतना में सजीव करने के लिए। अपने दैनिक जीवन में अपने सच्चे स्वरूप को प्रकट करना ही कृष्ण के जन्म होने का असली रहस्य है।
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