शास्त्रों में तंत्र के संबंध में जो कुछ कहा गया है, वह सांकेतिक ज्यादा है। लेकिन जो कहा है, उसमें दो बातें मिलती हैं-एक साधना का फल और दूसरा विधि का कोई छोटा-सा अंश। विधि विधान संकेतों में बताए गए हैं। किस मनोभूमि का मनुष्य, किस समय, किन उपकरणों द्वारा, किन मंत्रों से क्या प्रयोग करें, वह सब उस संकेत सूत्र में छिपाकर रखा गया है।
छिपाया इसलिए है कि अनाधिकारी लोग उसका प्रयोग न कर सकें। और कहा इसलिए गया है कि उस तथ्य का विस्मरण न हो जाय। विद्या का आधार मालूम रहे। अपनी साधना और उसके विधि विधान को गुप्त रखने का एक आध्यात्मिक कारण भी है। साधना की प्रसिद्धि जब दूसरों में फैलती है, तो साधक का यश फैलना भी स्वाभाविक है।
इस सम्मान से साधक के मन में अहंकार की प्रवृत्ति जागती है, जो साधक के लिए अत्यन्त घातक सिद्ध होती है। यदि साधक इस स्तर पर पहुंच गया हो कि वह अपने तप की पूंजी से दूसरों को भी लाभाविन्त कर सकें, तो उसकी आत्मिक गिरावट की आशंका भी दिखाई देने लगती है।
कारण स्पष्ट है- उसकी चर्चा सुनकर लोग अपनी इच्छाओं और कामनाओं को पूरा कराने के लिए उसके पास पहुंचने लगते हैं। यदि किसी को किसी प्रकार लाभ हुआ है, तो वह साधक को सिद्ध पुरुष घोषित कर देता है। साधक को भी अपनी सफलता पर प्रसन्नता होती है। अब वे उलझन में फंस जाते हैं। यदि किसी को निराश लौटना पड़ा, तो उनके सम्मान को धक्का लगेगा।
सबकी आशाओं की पूर्ति करने लगें तो अपनी आत्मिक सम्पत्ति हो जाएगी, जिसे पूरा करने के लिए भारी तपस्या करनी होगी। साधना के दौरान दूसरों पर जरा निर्भर नहीं होना चाहिए। भोजन, वस्त्र और आवास आदि के साथ दिनचर्या के सभी काम अपने आप करना होता है। यहां तक कि अपने बिस्तर और आसन आदि बिछाने से लेकर उनकी सफाई तक खुद करना पड़ती है। अपने शरीर के लिए थोड़ी भी सहायता दूसरों से ली गई तो साधना भ्रष्ट होने की सम्भावना रहेगी, क्योंकि जो दूसरों की सेवा ग्रहण कर रहे हैं, न जाने वह कैसा है?
मानसिक निर्माण उस अन्न पर निर्भर करता है। कुलार्णव तंत्र में स्पष्ट है- यस्यान्नेन तु पुष्टांगों पर होमं समाचारेत्। अन्नदातु फलस्यार्ध चार्धं कर्तुर्न संशयः॥ -कुलार्णव तंत्र अर्थात - दूसरे व्यक्ति की सेवा का आश्रय लेकर किए गए तप, हवन करने वाले साधक को उसका आधा फल ही मिल पाता है, उसका आधा तो अन्न देने वाले को मिलता है।'' साधना को प्रकट करने में हानि ही हानि परिलक्षित होती है, क्योंकि उससे अहंकार का पोषण होता है। इसे आध्यात्मिक मार्जन का शत्रु माना जाता है।
जब तक अहंकार मन में निवास करता है, तब तक साधना में प्रगति रुकी रहती है। अतः यह पुष्ट न होने पाए, इसके लिए तंत्र-शास्त्रों में कड़े नियम निर्धारित किए गए हैं, उनमें प्रमुख है-अपनी साधना का किसी पर प्रकट न करना। जब जनसाधारण को यह पता चल जाता है कि यह व्यक्ति तांत्रिक साधक है, तो उसी दिन उस साधक की मृत्यु मान लेनी चाहिए।'' इसलिए साधक की भलाई इसी में है कि वह अपनी साधना का ढोल न पीटे, वरन उसे छिपाकर रखे तभी वह अंत तक उसके निर्विघ्न संचालन में सफल हो पाएगा।