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सीख: कई बार जो हम सोचते हैं, असलियत उससे कुछ अलग ही होती है

Tue, 09 Jan 2018 05:56 PM IST
अमर उजाला संपादकीय डेस्क
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honesty
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गरिमा और देवांश नया साल मनाने के लिए महाबलेश्वर गए थे। वहां पहाड़ों के पास उन्होंने एक लॉज बुक कराया था, जहां  वे ठहरे थे। उनके पास घूमने के लिए तीन दिन थे। लॉज के मैनेजर से कहकर उन्होंने एक टैक्सी बुक कराई। देवांश ने टैक्सी वाले कमलेश से बात करनी शुरू की। कमलेश ने देवांश को दो-तीन पैकेज समझाए और पैसे भी बताए। देवांश को जाने क्यों, पैसे ज्यादा लग रहे थे। देवांश का कमलेश के साथ जाने का जरा भी मन नहीं था, लेकिन गरिमा ने देवांश को समझाया और वे लोग घूमने के लिए मान गए।
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टैक्सी पांच घंटे और छह सौ रुपये में तय हुई। जब वे लोग टैक्सी में घूमने निकले, तो देवांश ने देखा कि टैक्सी वाले ने चार सौ पचास रुपये का टोल जमा किया। देवांश यह देख हैरान था। उसने कमलेश से पूछा, तुमने चार सौ पचास रुपये का टोल दे दिया, तो तुम्हारे पास क्या बचा।

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कमलेश बोला, साहब यहां पर आम तौर पर पांच घंटे की टैक्सी का लोग हजार रुपये लेते हैं, लेकिन आज सुबह से कोई सवारी नहीं मिल रही थी। इसलिए जब आपने बुलाया, तो मैंने जान-बूझकर ऐसे पैसे बताए कि आप मुझे मना न करें। ये जो डेढ़ सौ रुपये मेरे पास बचे हैं, इनसे मुझे अपने बेटे के लिए कुछ मिठाई खरीद कर ले जानी है। मेरा बेटे ने आज कई महीनों बाद मुझसे कुछ मांगा है। देवांश ने पूछा, लेकिन इससे तो तुम्हें बहुत नुकसान हो गया।
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कमलेश बोला, साहब कम से कम मैं अपने बच्चे के चेहरे पर मुस्कान तो देख पाऊंगा। देवांश और गरिमा काफी देर तक एक दूसरे का चेहरा देखते रहे। कुछ देर बाद देवांश ने एक अच्छी मिठाई की दुकान से कुछ मिठाई खरीदी और वापस लॉज लौटते वक्त मिठाई के साथ अलग से सौ रुपये जेब से निकाल कर कमलेश को दिए। लेकिन कमलेश ने वे पैसे लेने से इन्कार कर दिया और कहा, साहब, मैंने आज अपने सौदे से ज्यादा पैसे ले लिए, तो मैं अपने आप से ईमानदारी नहीं कर पाऊंगा।

अमर उजाला के हरियाली और रास्ता पन्ने से साभार
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