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आज भी धरती पर तपस्या में लीन हैं भगवान विष्णु के छठे अवतार

Sat, 11 May 2013 04:02 PM IST
ब्रह्मानंद शास्त्री
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अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनुमांश्च विभीषण:
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कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन:।। - श्रीमद्भागवत महापुराण

पौराणिक परंपरा में जिन सात व्यक्तियों को अजर अमर माना गया है, उनमें परशुराम एक हैं। कहते हैं कि राम के शौर्य, पराक्रम और धर्मनिष्ठा को देख कर वे हिमालय चले गए थे। उन्होंने बुद्धिजीवियों और धर्मपुरुषों की रक्षा के लिए उठाया परशु त्याग दिया।

तप, स्वाध्याय शिक्षण और लोकसेवा छोड़कर आपद्धर्म के रूप में शस्त्र उठाने का प्रायश्चित करने के लिए हिमालय क्षेत्र में समय व्यतीत किया। क्योंकि परशुराम चिरजीवी हैं, इसलिए माना जाता है कि आज भी सशरीर वे हिमालय के किन्हीं अगम्य क्षेत्रों में निवास करते हैं।
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वहीं राम के सुझाए प्रायश्चित कर्म में लगे हैं। महाभारत के अनुसार परशुराम अपने आश्रम में तपस्वी और विद्याव्यसनी छात्रों को शस्रविद्या सिखाते थे ताकि वे शास्त्रधर्म का पालन करते हुए जरूरत पड़ने पर अपनी रक्षा आप कर भी सकें।

आपको याद होगा कि महाभारत के एक प्रसंग के अनुसार कर्ण अपने आपको छुपा कर तापस कुमार के रूप में परशुराम से ब्रह्मास्त्र संधान सीखने गए थे। परशुराम ने उन्हें यह विद्या सिखाई भी। लेकिन रहस्य खुल गया कि कर्ण ब्राह्नणकुमार नहीं है और अपनी असलियत छुपा कर शिष्य बने थे।

इस अपराध के कारण परशुराम ने कर्ण को शाप दिया कि जब इस विद्या की जरूरत पड़ेगी तब वह ब्रह्मास्त्र चलाना भूल जाएगा। चिरजीवी होने के कारण ही परशुराम राम के काल में भी थे और कृष्ण के काल में भी।

मान्यता है कि रामावतार के समय भगवान राम ने इन्हें सुदर्शन चक्र सौंपा था और कहा था कि जब कृष्ण रूप में अवतार लेंगे तब उन्हें इसकी जरूरत पड़ेगी। इसलिए जब श्री कृष्ण ने अपनी शिक्षा पूरी कर ली तब परशुराम जी ने श्री कृष्ण को उनकी अमानत सुदर्शन चक्र लौट दिया।

मान्यता है कि परशुराम जी कल्प के अंत तक धरती पर ही तपस्यारत रहेंगे। विष्णु के छठे 'आवेश अवतार' परशुराम का जन्म अक्षय तृतीया (वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया) को हुआ मानते हैं। उनका वास्तविक नाम राम था किंतु परशु धारण करने से परशुराम कहा जाने लगे।

भगवान शिव से उन्होंने एक अमोघास्त्र प्राप्त किया था जो परशु नाम से प्रसिद्ध है। परशुराम योग, वेद और नीति में पारंगत थे। उन्होंने महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की।

कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें कल्प के अंत तक तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया। उस काल में हैहयवंशीय क्षत्रिय राजाओं का अत्याचार था। राजा सहस्रबाहु अर्जुन आश्रमों के ऋषियों को सताया करता था। उसने परशुराम के पिता को भी मार दिया था।

परशुराम ने धरती को सहस्रबाहु के आतंक को नष्ट करने के लिए उसका वध कर दिया। इसके बाद उन्होंने क्षत्रिय शासकों के अत्याचार आतंक के खिलाफ लंबे समय तक संघर्ष किया। पौराणिक उल्लेखों के अनुसार परशुराम ने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रिय शासकों के आंतक से मुक्त कराया।
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परशुराम का कार्य क्षेत्र गोमांतक (गोवा) कहा जाता है। राम से साक्षात्कार होने और उन्हें अवतार के रूप में पहचानने के बाद वे हिमालय चले गए। ऋषि धर्म के विपरीत शस्त्र उठाने का प्रायश्चित करने के लिए कहते हैं कि परशुराम ने हिमालय की घाटी में फूलों की घाटी बसाई।
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