शरद पूर्णिमा की रात को गाय के दूध से बनी खीर या केवल दूध छत पर रखने का प्रचलन है। कुछ लोग गाय के दूध में भी केसर मिलाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस रात आसमान से चन्द्र देव अमृत बरसाते हैं। चंद्रमा द्वारा बरसाई जा रही चांदनी खीर या दूध को अमृत से भर देती है।
इस रात मध्य आकाश में स्थित चंद्रमा की पूजा करने का भी विधान है जिसमें उन्हें पूजा के अंत में अर्घ्य दिया जाता है। भोग भी भगवान को इसी मध्य रात में लगाया जाता है। फिर उसे सुबह स्नान ध्यान पूजापाठ करने के बाद प्रसाद के रूप में बांटकर खाया जाता है।
इसी दिन के बाद से हेमंत ऋतु की शुरूआत भी होती है। लक्ष्मी जी के भाई चंद्रमा इस रात पूजापाठ करने वालों को शीघ्रता से फल देते हैं। इस पूर्णिमा को कई लोग सत्यनारायण की पूजा भी इसीलिए करते हैं। अगर हो सके अपने इष्ट की आराधना करते हुए उपवास जरूर करें। इष्ट कुलदेवी या कुलदेवता के साथ गणेश जी और चंद्रदेव की पूजा फलदायी होती है।