दुर्घटना के बाद टूट चुकी जेसिका की कहानी, जिसे एक छोटे बच्चे की बातों ने उठ खड़े होने की प्रेरणा दी।
बारहवीं क्लास के बच्चों के लिए वह स्कूल का आखिरी दिन था। स्कूल की प्रिंसिपल चैताली मैडम उनको संबोधित कर रही थीं। वह बोलीं, आज से आप सब आत्मनिर्भर बनने जा रहे हैं। कई ऐसे मौके भी आएंगे, जो आपको तोड़कर रख देंगे। लेकिन उन पलों में अगर आप खुद पर विश्वास रखें, तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक पाएगा। यह मैं अपने अनुभव से आपको बता रही हूं।
करीब चालीस साल पहले मैं और मेरी दोस्त जेसिका बस स्टॉप पर खड़े बस का इंतजार कर रही थीं कि तभी सड़क की दूसरी तरफ से एक गाड़ी अनियंत्रित होकर सीधे जेसिका से जा टकराई। जेसिका बस स्टॉप के पीछे दूर एक खेत में जाकर गिरी। तीन महीने के बाद जेसिका खतरे से बाहर हुई, पर उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई थी। जेसिका के मां-बाप के चेहरे से भी खुशी गायब हो गई। जेसिका के सारे सपने चकनाचूर हो गए थे। वह हार चुकी थी और अब जिंदगी में उसके लिए कुछ नहीं बचा था। एक दिन मैं उससे मिलने गई, तो वह फूट-फूटकर रोने लगी। तभी पास में खेल रहा एक तीन-चार साल का बच्चा जेसिका के पास आया और उसे रोता देख उसे मनाने लगा।
वह बोला, दीदी, क्यों रो रही हो? आपको भी मेरी तरह चोट लग गई है न। पर उस पर हमें ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए। मां कहती हैं, दुनिया में कोई भी चीज ऐसी नहीं, जो हम नहीं कर सकते। अगर खुद पर विश्वास हो, तो हम सब कुछ हासिल कर सकते हैं। वह बच्चा अनजाने में जेसिका को जीने की नई उम्मीद दे गया। कुछ ही दिनों में जेसिका ने बैसाखियों की मदद से चलना सीख लिया। डॉक्टरों ने उसे एक नकली पैर और जूता बनाकर दिया, ताकि वह बिना बैसाखियों के भी चल सके। जेसिका ने हिम्मत नहीं हारी और आगे चलकर कृत्रिम अंगों की मदद से पर्वतारोहरण भी किया।