वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को भगवान विष्णु के अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की प्राणप्रिया, सर्वमंगलदायिनी, पतिव्रताओं में शिरोमणि, जगत जननी माता सीताजी का प्राकट्य हुआ।
मां लक्ष्मी का अवतार माता सीता भूमि रूप हैं। भूमि से उत्पन्न होने के कारण उन्हें भूमात्मजा और राजा जनक की पुत्री होने से उन्हें जानकी भी कहा जाता है। वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को भगवान विष्णु के अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की प्राणप्रिया, सर्वमंगलदायिनी, पतिव्रताओं में शिरोमणि, जगत जननी माता सीताजी का प्राकट्य हुआ। यह दिन जानकी नवमी या सीता नवमी के नाम से जाना जाता है।
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सीता नवमी का महत्व
धर्मशास्त्रों के अनुसार इस पावन पर्व पर जो भी भगवान राम सहित मां जानकी का व्रत-पूजन करता है उसे पृथ्वी दान का फल व समस्त तीर्थ भ्रमण का फल स्वतः ही प्राप्त हो जाता है एवं समस्त प्रकार के दुखों, रोगों व संतापों से मुक्ति मिलती है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने वाली सुहागिन स्त्रियों को अखंड सौभाग्य मिलता है और कुंवारी कन्याओं को अच्छे वर की प्राप्ति होती है। इस दिन घर में रामायण का अखंड पाठ करने से घर की नकारात्मकता दूर होती है। घर में सुख-शांति आती है। मान्यता है कि जिन कन्याओं के विवाह में विलंब हो रहा हो या फिर जिन्हें मनचाहा जीवनसाथी मिलने में दिक्कतें आ रही हो, उन्हें इस दिन विशेष रूप से पूजा और व्रत करना चाहिए।
सुखद जीवन जीना सिखाती हैं मां सीता
देवी सीता पवित्रता, त्याग, समर्पण, विनयशीलता, साहस और धैर्य के प्रतीक के रूप में पूज्यनीय हैं। उनकी त्याग व तपस्या समस्त नारी जाति के लिए अनुकरणीय है। भारतीय संस्कृति में श्रीराम-सीता आदर्श दंपति हैं। श्रीराम ने जहां मर्यादा का पालन करके आदर्श पति और पुरुषोत्तम पद प्राप्त किया वहीं माता सीता ने सारे संसार के समक्ष अपने धर्म के पालन का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। समाज को उनसे संस्कार और जीवन प्रबंधन के बारे में सीख लेनी चाहिए।
सीताजी श्रीराम के साथ वनवास में रही, जबकि उनका जाना जरूरी नहीं था। यह बात इस तरफ इशारा करती है कि किसी की परिस्थितियां बदलने से हमारी उसके प्रति निष्ठा नहीं बदलनी चाहिए। हमारी निष्ठा और प्रेम ही हमें ऊंचा पद दिलाते हैं।
रावण ने अपहरण कर मां सीता को अशोक वाटिका में रखा था, जहां रावण ने माता सीता को तरह-तरह के कष्ट दिए। परंतु पूरे विश्वास के साथ उन्होंने रावण का डटकर सामना किया। सभी को माता सीता के इस गुण से यह सीखना चाहिए कि कितनी भी विषम परिस्थितियां क्यों न हो हमें उनसे डरकर भागना नहीं बल्कि उनसे पूरे धैर्य और सूझ-बूझ के साथ उनका मुकाबला करना चाहिए। किसी भी हालत में मनुष्य को अपना धीरज नहीं खोना चाहिए। इस पावन दिन सभी दंपतियों को श्रीराम-सीता से प्रेरणा लेकर अपने दांपत्य को मधुरतम बनाने का संकल्प करना चाहिए।