फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

शक्ति और ज्ञान अर्जन का दिन है दशहरा

Sun, 13 Oct 2013 07:46 AM IST
अध्यात्मिक गुरू, योगी अश्विनी
विज्ञापन
विज्ञापन
सूर्य और चंद्रमा की गति विभिन्न प्रकार की ऊर्जा लहरों की रचना करती है। उदय होते हुए सूर्य अथवा प्रातः की संध्या के समय सूक्ष्म शक्तियां अपनी चरम सीमा पर होती हैं और यह समय आध्यात्मिक साधनाओं के लिए उपयुक्त होता है।
विज्ञापन


सूर्य ढलने के समय अथवा सांयकालीन संध्या के समय स्थूल शक्तियां अपनी चरम सीमा पर होती हैं जिससे नकारात्मकता बढ़ती है। इसी प्रकार से पूर्णिमा के समय शक्तियां निरंतर प्रवाह की स्थिति में होती हैं। अपने आसपास देखें तो पूर्णिमा के दिन आपको विशिष्ट परिवर्तन होते हुए दिखाई देंगे। समुद्र ज्वार के कारण अशांत होने लगते हैं। पशु का व्यवहार आक्रामक हो जाता है।

मानसिक तौर से असंतुलित व्यक्ति इस दिन स्पष्ट रुप से विचलित मानसिकता का प्रदर्शन करते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि शक्तियों का रुप बदल रहा होता है। और हमारे ऊर्जा स्वरुप न केवल दिन के अलग अलग समय में परिवर्तित होते हैं, अपितु कुछ विशेष दिनों में हमारी ऊर्जा अपने चरम पर होती है। ऐसा ही एक दिन है-दशहरा।
विज्ञापन


आश्विन शुक्ल की दशमी तिथि को मनाए जाने वाली यह पर्व सामान्य रुप से बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। लेकिन इसके पीछे एक गहन अर्थ छिपा हुआ है।

वैदिक ऋषि अपार ज्ञान के भंडार थे। उन्होंने सृष्टि के रहस्यों को, इसके स्रोत को, इसकी कार्यप्रणाली को, अंत को व इसके पुनः सृजन की गुत्थी को सुलझा लिया था। केवल एक साधारण व्यक्ति ही उन दिनों को हर्षोल्लास मनाने का माध्यम समझने की गलती कर सकता है वरना इन तिथियों का महत्त्व ऊर्जा ही है।

रावण वास्तव में एक पंडित था। वह व्यक्ति जिसने शिव तांडव स्तोत्र की रचना की, वह कोई साधारण असुर नहीं हो सकता। वह स्वर्ग लोक का द्वार पाल था और भूलोक के कष्ट व भोगों से युक्त जीवन व्यतीत करने का उसे श्राप मिला था।

उसे माया के बंधन से मुक्त करने के लिए भगवान विष्णु को स्वयं धरती पर आना पड़ा। यह प्रसंग युग परिवर्तन अथवा शक्तियों के परिवर्तन को भी दर्शाता है। इसे समझने के लिए मैं आपको एक कथा से अवगत कराता हूं। हनुमान की माता अंजना वास्तव में स्वर्गलोक की अप्सरा थी। एक दिन वह मर्यादा के विपरीत नृत्य और उछल कूद कर रही थी तो उसे भूलोक में जाकर वानर का जीवन व्यतीत करने का श्राप दे दिया गया।

समय बीतने के साथ वह माया में इतना बंध गई कि जब उसके शाप की अवधि समाप्त हुई तो उसने स्वर्ग लोक लौटने से इंकार कर दिया। अंत में जब वह पृथ्वी के सत्य से अवगत हुई तो उसने वापस लौटने का और माया के बंधनों से मुक्त होने का निर्णय लिया।

जो व्यक्ति जीवन के चरम सत्यों की खोज में हैं, उनके लिए ये कथाएं संकेत मात्र हैं जिससे कि सृष्टि के आधारभूत स्वरुपों तक पहुंचा जा सके व उनके अंदर छिपी शक्ति को वश में किया जा सके। दशहरे के दिन ऊर्जा स्वरुप कुछ इस प्रकार का होता है कि ब्रह्मांड के सत्य अति सरलता से उजागर हो सकते हैं जिससे कि आप माया के बंधनों से परे जाने में सक्षम हो जाएंगे।

अज्ञानी के लिए यह दिन ज्ञान प्राप्त करने का दिन है, स्वार्थी के लिए यह दान करने का दिन है, अभिमानी के लिए यह विनम्रता का दिन है, क्रोधी के लिए यह क्षमा करने का दिन है और आध्यात्मिक उत्थान की अभिलाषा रखने वाले के लिए यह दिन साधना माध्यम से स्वयं को भौतिक, भावनात्मक व आर्थिक असंतुलन से मुक्त कर प्रकृति व संतुलन की ओर अग्रसर करने का दिन है।

साधक दशहरे के दिन अपने गुरु के मार्गदर्शन में सृष्टि के क्रियाकलापों में योगदान देने के लिए मंत्र साधना व हवन के द्वारा दिव्य शक्तियों का आह्वान करते हैं और इस प्रक्रिया से अपने अंदर ही दिव्यता को प्राप्त कर लेते हैं।
विज्ञापन

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें