जब प्रलय आता है तब समुद्र भी अपनी मर्यादा त्याग कर किनारों का साथ छोड़ देता है। लेकिन सज्जन मनुष्य प्रलय एवं विपत्ति में भी अपनी मर्यादा नहीं त्यागते हैं। आचार्च चाणक्य