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तब गंगा वापस भगवती और परमपावनी बन जाएगी

Tue, 18 Jun 2013 10:15 AM IST
स्वामी चिदानंद सरस्वती
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प्रकृति जगत में भी सद्भाव-संपन्न सहकारिता का उदाहरण हिमालय सुता ‘गंगा’ के रूप में प्रत्यक्ष विद्यमान है। गंगा जब गोमुख से निकलती है, तब उसका स्वरूप बहुत छोटा होता है।
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उद्गम से प्रकट होने वाला छोटा सा निर्झर जब आगे बढ़ता है तो लगता है- उसकी पतली-सी जलधारा सूखी धरती द्वारा बहुत आगे तक न चलने दी जाएगी और उसकी स्वल्प संपदा को कुछ ही मील का भू-भाग आत्मसात कर लेगा। हवा के झोंके उस छोटी सी जलराशि को सुखाने में देर न लगने देंगे।

आगे चलते हैं तो वस्तुस्थिति बदलने लगती है। निर्झर उदारचेता बन जाते हैं। महान उद्देश्य के लिए समवेत होने की देव परंपरा स्वीकार करते हैं। हिम-प्रदेश में निर्झरों के सामूहिक सहयोग से संपन्न होकर आगे बढ़ती और विशाल कलेवर धारण करती है। वहां से गंगा क्रमशः थोड़ी गहरी और गतिगामिनी बनती है। समर्पण और समन्वय का तत्वज्ञान यही मिलाजुला प्रयास है जिसके आधार पर महान प्रयोजन सधते हैं।
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जलनदों की छोटी-छोटी इकाइयाँ मिलती चली जाती है। हिमालय छोड़ने तक गंगा गौरवशाली बन जाती है। मैदानी नदियां भी इसी नीति को अपनाती है और गंगा के साथ मिलने में घाटा नहीं उठाती, लाभान्वित ही होती हंै।  समन्वय क्रम चलता है।

गंगा का आकार, विस्तार बढ़ता है और उस समर्थता से संसार अनुग्रहीत होता है। गंगा बिहार में पहुंचकर मूल उद्गम की तुलना में कई गुना गुना बढ़ जाती है। गंगोत्री की पतली-सी धारा देखकर यहां के विस्तार पर एकाएक भरोसा नहीं होता कि यह भागीरथी की वही छोटी-सी लकीर है।

बंगाल में पहुंचने पर गंगा हजार रूपों में विभाजित होती हैं और वह समस्त भूखंड हरीितमा और संपन्नता से शोभायमान होता है। अन्ततः  वह समन्वित चेतना समुद्र में मिलती और अगाध जलराशि में बदल जाती है। इसी तत्वज्ञान के बल पर आज उन्हीं मां गंगा की स्वच्छता, निर्मलता व अविरलता को वापस लाया जा सकता है।

इसके लिए जरूरी है कि गंगा को मां की तरह मानें और उसके प्रति वैसी ही श्रद्धाभरी दृष्टि रखें। इस पूज्य दृष्टि का अभाव ही है कि गंगा में हर पल हजारों टन ठोस कूड़ा-कचरा फेंका जा रहा है। सबसे बड़ा नुकसान नदियों में कारखानों से आने वाली दूषित काले जल के मिलने से है। जिसमें जल की शुद्धता पर ही प्रश्नचिह्न लग जाता है।

कृषि से लेकर विभिन्न क्षेत्रों में जहरीले रसायनों का भारी मात्रा में प्रयोग किया जा रहा है। गंगा के प्रति इन अपराधों को त्यागने का संकल्प लिया जाना चाहिए और उसके दिव्य स्वरूप की पुन: प्रतिष्ठा करें। इस दिशा में सोचें और प्रयास करें तो गंगा एक विशाल नाले से वापस भगवती और परमपावनी बन जाएगी।
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