भगवान शंकर और भगवान श्रीहरि में भेद करना भक्तिभाव को कमजोर करता है।
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ज्ञान देने वाले गुरु का अनादर करना तीसरा अपराध है।
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नाम से बड़ा कोई पुण्य नहीं, कोई तीर्थ नहीं
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पैसे या स्वार्थ के लिए किसी को नाम देना
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नाम केवल सुनने से नहीं, मन से करने से फल देता है।
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- नाम की महिमा सुनकर भी जप न करना: नाम की महिमा सुनने के बावजूद मन से नाम-जप न करना नौवाँ अपराध है। नाम केवल सुनने से नहीं, मन से करने से फल देता है।
- अहंकार और सांसारिक बंधनों में फँसना: नाम की महिमा सुनने के बाद भी “मैं, मेरा, मेरे पद” में अटका रहना, विषय भोगों में लिप्त रहना और भगवान के नाम का आश्रय न लेना दसवाँ अपराध है।
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