आराध्य का स्मरण ही सुमिरन है और सुमिरन आराध्य के प्रति श्रद्धानिष्ठ बनने की सतत प्रक्रिया है। इस आराधन प्रक्रिया को जो जितने मनोयोग से करता है, वह उतने ही आत्म संतोष की अनुभूति करता है। आत्म संतोष की यह संजीवनी उसे तनावमुक्त रखने के साथ शांत-सुखद जीवन जीने और कार्यक्षेत्र में सफल होने की ऊर्जा प्रदान करती है।
सुमिरन रोज करना चाहिए उसका महत्व सर्वकालिक है, किंतु लोग परमात्मा को दुख में ही याद करते हैं। इसका प्रचलन कुछ ज्यादा है। संकट से मुक्ति पाने के लिए व्यक्ति तरह-तरह की मनौतियां मानता है, लेकिन संकट टलने पर फिर वह निश्चिंत हो जाता है और सुमिरन बंद कर देता है। वह सुमिरन को संकटमोचन की तरह प्रयोग करता है। कबीर ने भी कहा है ,दुख में समिरन सब करें सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे को होय॥
इसलिए सुख में भी अपने अभीष्ट एवं आराध्यदेव का सुमिरन करते रहना चाहिए। इसका कारण यह है कि जो सुमिरन दुख के समय मन को तनावमुक्त करके दुख से उबरने की शक्ति एवं धीरता प्रदान करता है, वह सुख में ऐसी लक्ष्मण-रेखा खींच देता है कि दुख का दशानन व्यक्ति के पास जाकर तनाव देने का साहस नहीं जुटा पाता। आठों प्रहर हर तरफ सुख ही सुख छाया रहता है।
यदि सुख मनुष्य की तनावमुक्त दशा का नाम है तो दुख तनावयुक्त दशा की संज्ञा है। इस तरह सुमिरन तनाव से मुक्ति का एक सरल और सहज साधन है। सुमिरन काल में मनुष्य की स्थिति उस तनावमुक्त, पूर्णतया निश्चिंत एवं प्रसन्नचित्त बालक के समान होती है जो आसन्न भय या संकट से बचने के लिए अपने पिता की गोद में जा बैठता है।
हमने स्वयं ही अपने जीवन में विकारों का जन्म दिया है। इसलिए हमें ही इनका नाश करना है। परिणाम पर दृष्टि न रखना और सुखद अनुभूति को ही जीवन मानना साधक का लक्षण नहीं है। जीवन में सुख के प्रलोभनों से ही तो दुख का भय रहता।
इस प्रकार यह कह सकते हैं कि सुख के भोगी को ही अंत में दुख भी भोगना पड़ता है। सुमिरन, अपने इष्ट का प्रेमपूर्वक स्मरण करने से विकारों का नाश उसी तरह होता रहता है, जैसे सुगंध के व्याप्त होने से तमाम तरह की गंध-दुर्गंध बिना भगाए ही तिरोहित हो जाती हैं।