गायत्री और यज्ञ एक दूसरे के पूरक हैं जीवन में ये दोनों ही होने चाहिए। गायत्री सदज्ञान की देवी है और यज्ञ सत्कर्मों का प्रेरक। जीवन में प्रगति इन दोनों के होने से ही होती है।
पढ़ें,जनेऊ धारण करने का यह एक बड़ा नुकसान है
यज्ञ का अर्थ त्याग, सहिष्णुता, दान और करुणा है। एक माँ भी जीवन भर यज्ञ करती हैं। जबसे बच्चा माँ के गर्भ में आता है, तभी से उसके जन्म होने और बड़ा होकर मनुष्य बनने तक उनके पालन पोषण रूपी यज्ञ ही माता पिता करते हैं।
माता-पिता के त्याग बलिदानों की पवित्रता भरी भावनाओं के कारण ही समाज को संस्कारित बच्चे मिलते हैं। भावनाओं में पवित्रता न रहने के कारण दूषित विचार वाले बच्चे पैदा होते और समाज में आपराधिक गतिविधियां बढ़ती हैं।
पढ़ें, जिन्होंने देवी से करना चाहा विवाह, मिली मौत की सजा
वर्तमान में समाज में बढ़ रही आपराधिक गतिविधियों का कारण भी यही है। दाम्पत्य जीवन में पवित्रता का समावेश करने का प्रयास करें तो फिर से संस्कारित पीढ़ियों का निर्माण किया जा सकता है।