देवी को विभिन्न नामों व प्रकार से पूजने के दौरान हम विभिन्न फूल जैसे चमेली, कमल, गेंदा व गुलाब आदि फूल अर्पित करते हैं। अर्थात बाहरी सुगंध व सुंदरता से जब हम अपना मन आंतरिक दैवीय विशेषताओं पर ले जाते हैं तो हमारी चेतना भी फूल के समान खिलती है।
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हम अपनी खिली हुई चेतना को भी अर्पित करते हैं। खिली हुई चेतना के माध्यम से उसकी पूजा करना ही सर्वोत्तम भेंट हैं। दिव्य मां शुद्ध चेतना, असीम, अथाह व सर्वोत्तम हैं। एक बच्चा अपनी मां को जानने की कोशिश नहीं करता।
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क्योंकि बच्चे को मां में पूर्ण विश्वास होता है। उसी तरह दिव्य मां में विश्वास रखना ही सबसे बड़ी मजबूती का स्रोत है। यही सबसे बड़ा धन और यही सर्वोत्तम भेंट है। नवरात्रे वह समय है जब हम पूर्णतया दिव्यता में स्वयं को भिगोकर आराम कर सकते हैं, हम स्वयं के जीवन में प्रचुरता का अनुभव कर आभारी हो सकते हैं।