मित्रो, हर बार एक नई कड़ी लेकर आपके सामने आता हूं। इस बार जो कहना चाहता हूं वह विषय पूर्णत: आपसे जुड़ा हुआ है। क्योंकि हमारी वह अवस्था है कि, हमारा घर है लेकिन हम अपने घर के बाहर खड़े है। हम अपने घर के भीतर जा ही नहीं रहे हैं। मैं आपसे कहता हूं कि आप मालिक हैं अपने घर के फिर भी घर के बाहर क्यों खड़े हैं? भीतर जाओ।
मालिक की तरह प्रत्येक आने-जाने वाले पर नियंत्रण रखो। हमारे पास सब कुछ है पर हम उसका उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए अपने मकान में प्रवेश नहीं कर पा रहे हैं। भीतर प्रवेश करो। जिस दिन आप अपने मकान में प्रवेश कर जाएंगे। भीतर आने वाली और बाहर जाने वाली चीज के प्रति जानकार होंगें वहीं आत्मबोध हो जाएगा, स्वजागरण हो जाएगा।
आपको एहसास ही नहीं है कि आप मालिक है। जब आपके भीतर की चेतना जागेगी कि आप मालिक है, तभी भीतर प्रवेश करेंगे, तो ही निरीक्षण कर पाएंगें। नियंत्रण पैदा कर पाएंगें। सुव्यवस्था करेंगे, तभी बुद्धि और विवेक का विकास होगा। आत्मज्ञान का दीपक जलेगा। हमें बोध नहीं है कि हम सब शक्तियों से परिपूर्ण है, प्रत्येक संभव व असंभव हमारे भीतर ही निहित है। उसे मोड़ऩा होगा।
साभारः परमहंस दाती जी महाराज
दाती जी महाराज परिचय
दाती
जी महाराज का जन्म 10 जुलाई 1950 को राजस्थान के पाली जिला में अलावास
गांव में हुआ। दाती जी महाराज बचपन से ही तीक्ष्ण बुद्घि के स्वामी थे।
बाल्यकाल में ही इनका लगाव ईश्वर से हो गया था। इन्होंने संसार में व्याप्त
ज्योतिष, ध्यान और शनि संबंधित भ्रांतियों को दूर करने का विचार किया।
इनकी विद्या, ज्ञान और कृपा से बहुत से भक्त लाभ प्राप्त कर रहे हैं। दाती
जी के तीन प्रमुख सिद्घांत हैं सेवा, सतसंग और सुमिरन।