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तीर्थयात्रा भौतिक शरीर की नहीं, आत्मा की होती है

Sun, 22 Apr 2018 11:37 AM IST
स्वामी हरिहरानंद
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तीर्थ का संस्कृत कोशों में अर्थ है, जहां से तैरते हुए दूसरे किनारे तक जाया जा सके। परिभाषा में कहा गया है कि जहां से प्रवाह में उतरकर उस पार जाएं। उस पार कहां? उत्तर है, उस पार अर्थात प्रवाह के दूसरे छोर पर। इसी धारा में उपयुक्त अर्थ तारने वाला या मोक्ष देने वाला है। प्राय: उस पवित्र स्थल को जहां लोग परिक्रमा, पूजा-पाठ, स्नान-मुंडन आदि कार्यों के लिए जाते हैं, उन्हें तीर्थ स्थान कहते हैं।
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प्राय: तीन प्रकार के तीर्थों का उल्लेख हमारे ग्रंथों में मिलता है- जंगम, मानस और स्थावर। महात्मा गांधी की शिष्या मैडलीन स्लेड अर्थात मीरा बेन ने अपनी आत्मकथा का नाम दिया, 'एक आत्मा की तीर्थयात्रा।' इससे तीर्थ के और नए अर्थ का उद्घाटन होता है। यात्रा या तीर्थयात्रा भौतिक शरीर की नहीं, आत्मा की होती है। यहां तीर्थयात्रा किसी स्थान विशेष की नहीं, सिद्धांतों की है। गांधीजी के सिद्धांतों को आत्मसात करने की यात्रा का वर्णन है। महापुरुषों के जन्म स्थान भी तीर्थ ही कहलाते हैं। अयोध्या और मथुरा तीर्थ हैं, क्योंकि राम और कृष्ण यहां जन्मे थे। 
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