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जानें कैसे, 'एड्स रोग होने का कारण है आपका धर्म'

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एड्स दुनिया के खतरनाक बीमारियों में से एक है जिसके कई कारण चिकित्सा विज्ञान बताता है। इनमें एक बड़ा कारण असुरक्षित यौन संबंध को माना गया है।
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लेकिन धर्म गुरु ओशो रजनीश जिन्होंने 'संभोग से समाधि' तक लिखकर पूरी दुनिया में नई बहस शुरु कर दी थी उन्होंने एड्स का एक ऐसा कारण बताया है जिसे जानकर आपके होश उड़ जाएंगे।

इन्होंने एड्स के जो कारण बताए हैं उसे जानकर एक बार तो आप सोचने को मजबूर हो सकते हैं कि आखिर ओशो ने ऐसा कहा तो कहा क्यों? इन्होंने एड्स के लिए धर्म को ही कटघरे में खड़ा किया है।
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ओशो के जीवन और उनके वचनों पर आधारित पुस्तक 'मैं क्यों आया था' में बताया है कि, ओशो के अनुसार 'एड्स का जिम्मेदार धर्म है'।

आखिर ओशो क्यों मानते हैं कि एड्स का जिम्मेदार धर्म है

ओशो के अनुसार एड्स बीमारी इस दुनिया में फैली, इसके लिए धार्मिक लोग ही जिम्मेवार हैं, क्योंकि उन्होंने ही ब्रह्मचर्य की धारणा निर्मित की, जो कि बिल्कुल ही गैर स्वभाविक है। यदि कोई व्यक्ति नपुंसक नहीं है, तो ब्रह्मचारी हो ही नहीं सकता।

अपना तर्क देते हुए ओशो कहते हैं कि यह बात समझनी जरुरी है कि पूरे इतिहास में कोई भी नपुंसक आदमी, किसी भी आयाम में सृजनशील नहीं रहा है- महान संगीतज्ञ, महान कवि, बड़ा वैज्ञानिक या ऋषि- कोई भी नहीं। क्योंकि यौन तुम्हारी उर्जा है- तुम्हारी सृजनशील उर्जा, दुनिया में जितने भी सृजनात्मक लोग हैं, वे सर्वाधिक कामुक लोग होते हैं।

ब्रह्मचर्य की शिक्षा प्रकृति के विरुद्घ है। साधुओं को मोनेस्ट्री में और साध्वियों को ननरी में अलग-अलग जगहों पर रखकर उन्हें मिलने की अनुमति न देने से समलैंगिकता पैदा हुई है। पुरुष होमोसेक्सुअल हो गए। स्त्रियां लेस्बियन हो गईं- और यही समलैंगिकता आज एड्स की महामारी को ले आई है।

क्या ब्रह्मचारी होना पाप है?

ओशो कहते हैं कि विश्व की प्रत्येक सरकार को 'ब्रह्मचर्य' एक अपराध घोषित कर देना चाहिए। और ब्रह्मचर्य का प्रचार करने वाले को तुरंत जेल में बंद कर देना चाहिए, क्योंकि वह व्यक्ति जानलेवा बीमारी एड्स का बीज बो रहा है।

ओशो काम वासना की वकालत करते हुए कहते हैं कि एड्स नामक बीमारी की जड़ें एकदम तर्कहीन और बौद्घिक रूप से असंगत विचारों और धारणाओं में है। प्रकृति ने तुम्हें प्रजनन की शक्ति दी है। क्या प्रकृति परामात्मा के विरोध में है?

यह बड़ी मजेदार बात है कि ईश्वर ने तो काम वासना को जन्म दिया, मगर उनके प्रतिनिधि काम के खिलाफ हैं और कहते हैं कि लोगों को ब्रह्मचारी होना चाहिए। उन्हें शरीर विज्ञान की, जीव विज्ञान की और शरीर के रसायनों और हारमोंस के संबंध में 'क, ख, ग' तक की समझ नहीं है।

एक आदमी ब्रह्मचर्य का व्रत ले सकता है, पर वह अपने शरीर को, उसकी कार्य विधि और उसकी रासायनिक प्रक्रियाओं को बदलने के लिए भला क्या कर सकता है? उसकी रासायनिक और जैविक प्रक्रियाएं पवित्र बाइबिल को नहीं पढ़तीं, वो पोप को नहीं समझती।
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तो क्या ब्रह्मचर्य एड्स का कारण है?

साधु संतों के शरीर में भी काम उर्जा उत्पन्न होती है, जीवित शुक्राणु बनते रहते हैं और शुक्राणु को रहने के लिए देह में छोटी सी जगह है। साधु भी भोजन करता है, श्वास लेता है, वह सारे काम करता है जिससे उर्जा उत्पन्न होती है, शक्ति मिलती है और पुराने शुक्राणु बाहर निकलने की जल्दी में हैं।

अब तुमने उस बेचारे आदमी को ऐसी मुश्किल में, ऐसी कठिन परिस्थितियों में डाल दिया....औ वह कुछ कर भी नहीं सकता। तुम उसे समझाओ कि 'राम राम जपो कि कहो अवे मारिया या नमो अरिहंताणम्, नमो सिद्घाणम'- मकर वे वीर्यकण इन सब मंत्रों की बकवास नहीं सुनते।

उनका मंत्रों में विश्वास नहीं है, वे श्रद्घालु नहीं हैं, उन्हें सिर्फ बाहर निकलने की शीघ्रता पड़ी है, क्योंकि उनका जीवनकाल बड़ा छोटा है। और वह बाहर निकलने का मार्ग खोज कर ही रहेंगे। यदि नैसर्गिक मार्ग नहीं मिलता तो काम विकृतियां पैदा हो जाएंगी। तुम्हारे धर्मों के कारण ही सारी विकृतियां पैदा हुई हैं।

यानी ओशो के अनुसार ब्रह्मचर्य ही एड्स का कारण है। अब आप खुद तय कीजिए कि ओशो की यह बातें आपकी नजर में कितनी सही और कितनी गलत है।
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