हार्दिक की कहानी, जिसे उसके पिता ने कार खरीद देने के बजाय खुद कार खरीदने के योग्य बनना सिखाया।
श्यामलाल जी का इकलौता बेटा था हार्दिक। श्यामलाल जी ने हमेशा हार्दिक को अपनी ख्वाहिशों के लिए लड़ना सिखाया। वह कहते थे, अगर तुममें कुछ पाने की ललक है, तो तुम्हें उसके काबिल बनना पड़ेगा। हार्दिक जब कॉलेज में पहुंचा, तो उसके दोस्तों ने बाइक खरीदी। कुछ ने तो कारें भी ले लीं। हार्दिक भी चाहता था कि वह कार या बाइक से कॉलेज जाए।
उसने पिता से बात की, तो वह बोले, मैंने तुम्हारे लिए एक खूबसूरत-सी कार देख रखी है। वह अनोखी कार है। पर उसे पाने के लिए तुम्हें अपने कॉलेज में अव्वल नंबर लाने होंगे। हार्दिक बोला, उसके लिए तो मुझे डिग्री पूरी करने तक इंतजार करना होगा। उसे लगा कि उसके पिता दुनिया के सबसे क्रूर पिता हैं। वह पिता से बोला, आप मुझे कार ला दीजिए, मैं वायदा करता हूं कि अव्वल आकर दिखाऊंगा। श्यामलाल जी बोले, मैं यह कैसे मान लूं? यह सुनकर हार्दिक को बहुत गुस्सा आया।
पर उसने ठान लिया कि वह सबसे अधिक नंबर लाकर ही दिखाएगा। चार साल बीत गए। हार्दिक पिता से नाराज तो था, पर उसने अपनी मेहनत में कोई कसर नहीं छोड़ी। उसने कॉलेज में टॉप किया। श्यामलाल जी का सीना गर्व से फूल गया। पर उन्हें पता था कि हार्दिक उनसे बहुत नाराज है। उन्होंने हार्दिक के लिए वह महंगी कार मंगवा ली। हार्दिक घर लौटते ही सबसे पहले अपने पिता के पास गया। श्यामलाल जी ने जब उसे कार की चाभी दी, तो वह बोला, पहले मैं आपसे बहुत नाराज था।
मेरे सारे दोस्तों के पिता ने उन्हें बड़ी-बड़ी कार और बाइक दिलाई, जबकि आपने मुझे आज तक कुछ नहीं दिलाया। लेकिन आज मुझे एहसास हो गया कि अगर बाकी पिताओं की तरह आपने भी मेरी हर ख्वाहिश पूरी की होती, तो मुझे चीजों की अहमियत समझ में नहीं आती। कॉलेज में अव्वल आने के साथ ही मेरा एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में चयन भी हो गया है। मैं अब अपने दम पर कार खरीद सकता हूं।