समुद्रगुप्त प्रतापी सम्राट थे, लेकिन चिंताओं से वह भी नहीं बच सके और परेशान रहने लगे। चिंताओं का चिंतन करने के लिए वह एक दिन वन की ओर निकल पड़े। वह रथ पर थे, तभी उन्हें एक बांसुरी की आवाज सुनाई दी। उन्होंने सारथी से रथ धीमा करने को कहा और बांसुरी के स्वर के पीछे जाने का इशारा किया।
कुछ दूर जाने पर समुद्रगुप्त ने देखा कि झरने के पास मौजूद वृक्षों की आढ़ से एक व्यक्ति बांसुरी बजा रहा था। सम्राट ने कहा, 'आप तो इस तरह प्रसन्न होकर बांसुरी बजा रहे हैं, जैसे कि आपको किसी देश का साम्राज्य मिल गया हो। 'युवक बोला, 'श्रीमान आप दुआ करें। भगवान मुझे कोई साम्राज्य न दे, क्योंकि अभी तो मैं सम्राट हूं। मगर, साम्राज्य मिलने पर कोई सम्राट नहीं होता है, बल्कि सेवक बन जाता है।'
युवक की बात सुनकर सम्राट हैरान रह गए। युवक ने कहा, ‘सच्चा सुख स्वतंत्रता में है। व्यक्ति संपत्ति से स्वतंत्र नहीं होता, बल्कि भगवान का चिंतन करने से स्वतंत्र होता है। सूर्य से राजा और प्रजा दोनों को रोशनी, वहीं धरती से जल भी। मुझमें और सम्राट में बस मात्र संपत्ति का ही फासला है।’ यह सुनकर युवक को सम्राट ने अपना परिचय दिया। युवक यह जानकर हैरान था, लेकिन राजा की चिंता का समाधान करने पर राजा ने उसे सम्मानित किया।
कहानी का तात्पर्य है कि चिंता, मानव मस्तिष्क का ऐसा विकार है, जो पूरे मन को झकझोर देता है। इसलिए चिंता नहीं चिंतन कीजिए, ये सोचिए कि आप ओरों से बेहतर क्यों हैं? इसका जवाब यदि आप स्वयं से पूछते हैं, तो आपकी चिंताओं का निवारण स्वयं ही हो जाएगा।