श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, मन ही कारण है आपके बंधन का और मन ही कारण होगा मुक्ति का। इसी के अज्ञान के कारण तुम बंधन में रहते हो और इसी मन की वजह से तुम मुक्त भी हो सकते हो। कारण, बंधन जहां पर है उसे खोला भी तो वहीं से जाएगा।
गांठ जहां पर है, वह खोली भी तो वहीं से जाएगी ऐसा तो नहीं होता है कि गांठ है यहां है और तुम खोलोगे वहां। कहां होती है वासनाएं? कहां हैं सब तृष्णाएं? असल में सबका कारण मन है। मन आपके साथ खेल खेलता रहता है, और आप हो कि खेल खेलते रहते हो।
मन इसी तरह कुछ न कुछ इच्छा प्रकट करता रहता है और मन की इच्छा को दबाना तुम्हारे लिए बड़ा ही मुश्किल हो जाता है तुम फिर इस तरह से प्रयास करते हो कि यह इच्छा कैसे पूरी हो जाए।
जब तक वह इच्छा पूरी नहीं होती, तब तक उसका कांटा तुम्हारे दिल में चुभता रहता है। एक बात तो नश्चित है कि एक इच्छा पूरी होने के बाद फिर किसी दूसरी इच्छा का कांटा तुम्हारे दिल में चुभने लगता है लेकिन मैं यह कहना चाहता हूं कि इच्छा अपने आप में ही एक बहुत बड़ा कांटा है।
साभार: 'मन के पार' पुस्तक से