कीर्तन योग का एक महत्वपूर्ण अंग है। जिस प्रकार शक्कर के बिना चाय और लवण के बिना व्यंजन अपूर्ण हैं, उसी प्रकार कीर्तन के बिना योग भी अपूर्ण है। कीर्तन किसी एक पंक्ति को बार-बार दोहराने का नाम भी नहीं है। वह नादयोग का एक हिस्सा भर है, जिसमें आप ध्वनि तरंगें उत्पन्न कर चेतनता पूर्वक उसका अनुसरण करते हैं। कीर्तन द्वारा आप स्वयं को शरीर तथा बाह्य वातावरण से दूर ले जा सकते हैं।
जब आप कीर्तन करते हैं, तो मानो भावनाओं के जेट वायुयान से यात्रा करते हैं। यदि नादयोग या कीर्तन पर कोई सेमिनार या समारोह किया जाए तो हजारों लोग उसमें भाग लेंगे, क्योंकि वे कीर्तन के रहस्य को जानते हैं। योग के दूसरे रूपों में आपको मन के साथ संघर्ष करना पड़ सकता है, किंतु कीर्तन में आप मन को अनदेखा कर आगे बढ़ जाते हैं।
पांच शताब्दी पूर्व चैतन्य महाप्रभु हुए थे। वह अपने समय के महान प्रतिभा संपन्न व्यक्ति थे। वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आध्यात्मिक जीवन के मार्ग में बुद्धि एक रोड़ा है। उन्होंने स्वयं में भक्ति भावना विकसित की और इसके लिए कीर्तन का रास्ता अपनाया। कीर्तन गाते-गाते वे भावाविष्ट हो जाते तथा हरे कृष्ण, हरे कृष्ण-कृष्ण हरे-हरे आदि पदों को घंटों दोहराते थे। जहां से भी वे निकलते ग्रामीणों की नाचती-गाती भीड़ उनके पीछे चलती थी।
यह काफिला एक गांव से दूसरे गांव पहुंचता था। चैतन्य महाप्रभु के बाद योग के विभिन्न अंगों के साथ कीर्तन जुड़ता गया। योग के कठिन अभ्यासों और साधना के साथ मधुर कीर्तन रूपी नादयोग का अभ्यास सोने में सुहागे का कार्य करता है। कीर्तन की कुछ धुनें सीखकर समूह में उनका अभ्यास कीजिए। कीर्तन को प्रभावी बनाने के लिए हारमोनियम, मृदंग और मंजीरों का उपयोग करना चाहिए।
इन वाद्यों के साथ अपने हृदय पक्ष और श्रद्धा का संपुट भी कीजिए। कीर्तन से स्वयं को कुंठाओं से मुक्त कर सकते हैं। जब आप कीर्तन में सम्मिलित होते हैं, तब पूरी तरह भूल जाइए कि आप वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर, प्राध्यापक, उच्चाधिकारी अथवा भद्र पुरुष या महिला हैं। यह व्यक्ति की सीमाएं हैं। इन्हें आपकी व्याख्या नहीं कहा जा सकता। ये ऊपर से थोपी गई विशेषताएं हैं। जब आप कहते हैं मैं प्रतिभा संपन्न अधिवक्ता, डॉक्टर अथवा बड़े घराने का भद्र व्यक्ति हूं, तब इसका तात्पर्य यह हुआ कि आप अपने ऊपर कुछ सीमाएं थोप रहे हैं। ये सीमाएं आपकी कीर्तन में पूरी तरह खुलने नहीं देंगी।
अस्तु, जब आप कीर्तन में जाएं, तो अपने अहम, पद की गरिमा, लोगों से दूरी आदि सब कुछ घर पर छोड़ दें। अपने को कुछ न मानते हुए कीर्तन के प्रवाह में बहने दें। तब और केवल तब ही आप अपनी कुंठाओं तथा सीमाओं का अतिक्रमण कर पाएंगे।
याद रखिए, कीर्तन कोई बौद्धिक योग नहीं है। कीर्तन में उत्पन्न हर ध्वनि तरंग आपकी चेतना की गहराई में उतरती है। बुद्धिजीवी कीर्तन को यदि बुद्धि के माध्यम से समझने की कोशिश करें तो संभवत: उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ेगा, क्योंकि कीर्तन का प्रयोजन व्यक्ति के भावनात्मक पक्ष को छूना है। यद्यपि भावनाओं को न तो समुचित ढंग से समझा जाता है और न ही उनका उपयोग किया जाता है, तथापि उन्हें व्यक्ति के हाथ में अत्यंत प्रभावी उपकरण माना जाता है।
बुद्वि के द्धारा आप कभी भी चेतना की गहराई में नहीं उतर सकते और न ही उसे पकड़ सकते हैं। हां बुद्धि के द्वारा ब्रह्म, जगत, सत्य आदि की सैद्धांतिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। परंतु इनका अनुभव कदापि नहीं कर सकते। ज्ञान और अनुभव में बड़ा अंतर है। याद रखिए, बुद्धि ज्ञान का तथा भावना अनुभव का माध्यम है।
यदि ईश्वर और शांति का अनुभव करना चाहते हैं तो आपको अपने व्यक्तित्व के भावनात्मक आयाम का विकास करना होगा। यदि आपका भावनात्मक पक्ष कुंद होगा, तो आप मंदिर अथवा गिरजाघर में भले ही लगातार कई दिनों तक घंटों ईश्वर पर व्याख्यान दें, परंतु वह आपसे दूर ही रहेगा। किंतु यदि आपकी भावनाएं आविष्ट हों तो ईश्वर का नामोल्लेख होते ही आप भावाविष्ट हो कर उसे अपने भीतर देखेंगे।