मकर संक्रांति के दिन यानी 14 जनवरी, 2014 को सूर्य दोपहर एक बजकर 12 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश कर रहा है। जिसका पुण्य काल पूरे दिन तक रहेगा। संक्रांतिकाल में किए गए एक पुण्य कृत्य से कोटि-कोटि फलों की प्राप्ति होती है।
लेकिन मकर एवं कर्क संक्रांति काल में पुण्य कार्य विशेष व अक्षय फलदायी होते हैं। जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, जो संक्रांति कहलाती है। जिसमें मकर राशि का विशेष महत्व है। मकर राशि, शनि की राशि है। शनि सूर्य का पुंज है। पिता पुत्र के घर जाकर अति प्रसन्न होता है।
सूर्य के घर आने पर शनि, सूर्य का सम्मान करता है। तीनों लोकों में कोई भी प्राणी अपने से महान अपने पुत्र को देखना चाहता है। शनि ने तपस्या करके अपने को महान बनाया। भगवान सूर्य अपने पुत्र की महानता को देखकर उन्हें आशीर्वाद देने के लिए उनके घर जाते हैं।
इसी भावानुसार हमारे यहां भी संक्रांति पर अपने माता-पिता श्रेष्ठजनों को मनाया जाता है। उत्तर भारत में तो बुजुर्गों को मनाने के साथ साथ पुत्रियों को भी तिल आदि के अच्छे-अच्छे खाद्य पदार्थ व उपहार भेजे जाते हैं। जिसे संक्रात भेजना कहते हैं। इसी प्रकार किसी न किसी बहाने उपहार, दान पुण्य आदि का विशेष प्रचलन है।
ज्योतिषानुसार मकर राशि दसवें भाव को बताती है। और दसवां भाव कर्म का है। इसलिए कर्म प्रधान राशि है। प्राणी मात्र को अच्छे शुभ और पुण्य कर्म करने की प्रेरणा देती है। जिसे व्यक्ति विशेष का उद्धार हो सके। दान सेवाभाव ही कल्याण का एक मात्र सुगम मार्ग है।
मकर संक्रांति में धार्मिक व सामाजिक कृत्यों का विशेष महत्व है। यह स्नान दान आदि के लिए परम लाभदायी है। इसमें तिल के प्रयोग का अधिक महत्व है। तिल से उबटन, स्नान आदि करना चाहिए। तिल युक्त जल पितरों को देना चाहिए। अग्नि में तिल से हवन करना चाहिए। तिल खाना खिलाना एवं दान करना चाहिए।