ब्रह्म के तीन
स्वरूप हैं परमात्मा, ब्रह्म और भगवान। लेकिन वह एक हैं, विभेद सिर्फ इनकी शक्तियों
में है। जिस तरह जल की तीन अवस्थाएं होती बर्फ, भाप और जल उसी प्रकार ब्रह्म के भी
तीन स्वरूप हैं लेकिन वास्तव में वह एक है। जिसमें दो शक्ति प्रकट हो अपनी सत्ता की
रक्षा और अपना स्वरूपानंद प्राप्त करने की शक्ति है उसे ब्रह्म कहते हैं।
जिसमें नाम भी हो, रूप भी हो, गुण भी हो तमाम शक्तियां प्रकट हों, सगुण
सकार महाविष्णु वह परमात्मा है। जिसमें सभी शक्तियां प्रकट हों और लीला भी हो,
परिकर भी हो वह हैं भगवान श्री कृष्ण। भगवान श्री कृष्ण के ही दो अन्य रूप हैं
परमात्मा और ब्रह्मा। पूर्ण शक्तियों का प्रकाट्य भगवान श्री कृष्ण में लेकिन कुछ
कम लेकिन, अधिक शक्तियों का प्राकट्य परमात्मा में। ब्रह्म में सिर्फ दो शक्तियां
हैं।
ब्रह्म के उपासक को ज्ञानी कहते हैं, परमात्मा के उपासक को योगी कहते
हैं और भगवान के उपासक को भक्त कहते हैं। जो आप हैं। भगवान श्री कृष्ण सजातीय और
विजातीय स्वगत भेद शून्य हैं।
इनके बराबर की जाति वाला चेतन जीव है।
विजातीय माया है। भगवान दोनों के शासक हैं। हम मनुष्य की तरह भगवान में जीव और शरीर
का भेद नहीं है इसलिए वह स्वगत भेद शून्य कहलाते हैं। उनका जीव ही शरीर है। गीता
में कहा गया है ब्रह्मा एक भी है और अनेक भी है वह प्रत्येक जीव में है।
शंकराचार्य ने कहा है कि भगवान भले ही एक जगह दिखाई देते हैं लेकिन वह सभी
जगह सभी चीजों में वर्तमान हैं। तभी तो वह खंभे से प्रकट होकर हिरण्यकश्यपु का वध
किया और 16 हजार 108 रानियों के साथ 16 हजार 108 रूप में एक साथ रहे। ब्रह्म सगुण
भी है और निर्गुण भी है।
पद्मपुराण में कहा गया है कि हमारी जो चर्म चक्षु
यानी हमारी सामान्य आंखों से वह दिखाई नहीं देता है, इसलिए निराकार है। अगर दिव्य
दृष्टि मिल जाए तो दिखाई भी देता है इसलिए सकार भी है।
साभारः कृपालु जी महाराज (ब्रह्म, जीव, माया)
कृपालु जी महाराज परिचय
कृपालु
जी महाराज का जन्म सन् 1922 ई. में शरद्पूर्णिमा की रात्रि में उत्तर
प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के मनगढ़ ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ
था।प्रारम्भिक शिक्षा के पश्चात इन्होंने इंदौर, चित्रकूट एवं वाराणसी में
व्याकरण, साहित्य तथा आयुर्वेद का अध्ययन किया। 16 वर्ष की अल्पायु में
कृपालु जी ने चित्रकूट के शरभंग आश्रम एवं वृंदावन के वंशीवट के निकट वनों
में वास किया। 14 जनवरी 1957 को कृपालु जी महाराज को काशी में विद्वानों की
एक सभा ने जगद्गुरू की उपाधि से सम्मानित किया।