मेरा जन्म एक पारंपरिक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। मेरे पिता फिल्म वितरक थे और मेरे चाचा फिल्म निर्माता। घर में हर रोज फिल्मों के बारे में बातें होती थीं। लेकिन हम बच्चों को ज्यादा फिल्म देखने की मनाही थी, क्योंकि फिल्मों को समय की बर्बादी माना जाता था। मैंने कभी नहीं सोचा था कि फिल्मों में अपना करियर बनाऊंगा, लेकिन सिनेमा ही मेरी नियति थी। जब मैं बीसेन्ट थियोसॉफिकल स्कूल में पढ़ता था, उसी समय खूब फिल्में देखने लगा था।
मैंने जमनालाल बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज, मुंबई से एमबीए की डिग्री हासिल की और चेन्नई में एक कंपनी में मैनेजमेंट कंसल्टेंट की नौकरी करने लगा। लेकिन मैं अपनी नौकरी से संतुष्ट नहीं था। कंसल्टेंट की नौकरी से अंसतुष्टि ने मुझे नई राह तलाशने के लिए प्रेरित किया। उसी समय मेरा एक मित्र रवि शंकर (निर्देशक बी.आर. पंथुलु का पुत्र) कन्नड़ में अपनी पहली फिल्म बनाने की प्रक्रिया में था। मैंने उस फिल्म में भागीदारी करने के लिए अपनी नौकरी से छुट्टी ले ली। बाद में मैंने पूरी तरह से नौकरी छोड़ दी और फिल्म निर्माण में लग गया। हालांकि वह फिल्म नहीं चली, लेकिन मैंने फिल्म निर्देशक बनने का मन बना लिया था।
मेरे पास एक स्क्रिप्ट थी और मैं प्रतिष्ठित निर्माताओं के साथ फिल्म बनाना चाहता था। मैंने कई निर्माताओं से बात की, लेकिन बात नहीं बनी। अंत में मेरे चाचा फिल्म निर्माण (पल्लवी अनु पल्लवी) के लिए तैयार हो गए, लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि फिल्म सीमित बजट में बनेगी। मैं सहमत हो गया। हालांकि वह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई कमाल नहीं कर सकी, लेकिन कर्नाटक सरकार की ओर से मुझे उसके लिए बेस्ट स्क्रीनप्ले अवार्ड मिला। उसके बाद मैंने तीन और फिल्में निर्देशित कीं, पर कोई खास सफलता नहीं मिली।
1986 में मैंने तमिल फिल्म मौना रागम फिल्म निर्देशित की, जिसे यथार्थवादी तरीके से शहरी तमिलों को चित्रित करने के कारण समीक्षकों ने सराहा। इस फिल्म ने मुझे निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया। 1990 के दशक में मैंने रोजा और बंबई जैसी लोकप्रिय फिल्में निर्देशित की, जिसे हिंदी सहित कई भाषाओं में डब किया गया। इन फिल्मों ने मुझे हिंदी भाषी दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाया। मेरे लिए स्क्रिप्ट और अभिनय सबसे महत्वपूर्ण है, तकनीक इसके बाद आता है। मेरी सफलता का सूत्र है कि फिल्म बेशक मनोरंजक बनाओ, पर अपने मूल विचार के प्रति ईमानदार रहो।