मार्क की कहानी, जिसने गलत सोच वाले मैनेजर को बैंक से निकालकर एक बड़ा संदेश दिया।
एक देश में एक बड़ा बैंक था। रोज वहां अनेक लोग आया करते थे। मार्क ने करीब चालीस साल पहले जब बैंक की कल्पना की थी, तब उसे पता भी नहीं था कि उसका बैंक इतना मशहूर हो जाएगा। उसका मानना था कि अगर सब साथ मिलकर काम करेंगे, तो हर चुनौती पार कर सकेंगे। कुछ साल बाद मार्क ने खुद को बैंक के काम से अलग कर लिया और कुछ काबिल कर्मचारियों को बैंक चलाने की जिम्मेदारी सौंप दी।
अब बैंक मार्क की सोच से नहीं, बल्कि कंपनी के एचआर और विभिन्न विभागों के आला अधिकारियों के निर्देशों से चलता था। एक बार मार्क बैंक की एक शाखा के सामने से गुजर रहा था कि उसने दरवाजे पर एक बड़ा कूड़ेदान पड़ा देखा। अंदर जाकर एक चपरासी से उसने पूछा, क्यों भाई, यह कूड़ेदान दरवाजे पर क्यों रख रखा है? चपरासी ने कहा, यह कूड़ेदान भारी हो गया है। मैं अकेले इसे नहीं हटा पा रहा। मैनेजर साहब कहते हैं, यह उनका काम नहीं है। वह कर्मचारियों को भी मेरी मदद करने नहीं देते।
ऐसे में, मैं क्या करूं? मार्क ने मैनेजर से जाकर पूछा, सर, आप दरवाजे से कूड़ेदान क्यों नहीं हटवाते। इसे देख कोई बैंक में नहीं आना चाहेगा। मैनेजर बिना सिर ऊपर उठाए बोला, मैंने म्युनिसिपैलिटी वालों को चिट्ठी भेजी है। वैसे भी साफ-सफाई का काम हमारा नहीं। मार्क पीछे मुड़कर चपरासी से बोला, तुम लोग कब से कचरे के साथ काम कर रहे हो। समय आ गया है कि इस ऑफिस का सारा कचरा बाहर निकाल दें। चपरासी और मैनेजर, दोनों मार्क को आश्चर्य से देख रहे थे। मार्क ने चपरासी के साथ मिलकर कूड़ेदान तो हटवाया ही, मैनेजर को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया। मैनेजर को जब मार्क के बारे में पता चला, तो वह उससे माफी मांगने आया। मार्क ने कहा, बाहर का कचरा एक बार न भी साफ हो, तो चलेगा, लेकिन मन में अगर कचरा आ जाए, तो कोई व्यवसाय, कोई नौकरी ज्यादा नहीं चल पाती।