1915 में महात्मा गांधी के मुंबई उतरने से पहले ही लोग उनसे कुछ इस तरह उम्मीदें लगाने लगे कि जैसे वे अवतार-पुरुष हों। मुंबई में गांधीजी और कस्तूरबा का अद्भुत स्वागत हुआ। मुंबई के बड़े-बड़े घरों में गांधीजी और कस्तूरबा के सम्मान में कई भोज हुए, पर तीन दिन में ही गांधीजी और कस्तूरबा इस सबसे ऊब गए। 12 जनवरी को एक स्वागत समारोह में गांधीजी ने अपनी उकताहट प्रकट कर ही डाली। समारोह में 600 से अधिक अतिथि आए थे।
गांधीजी ने कहा कि सोचा था कि अपने देश में दक्षिण अफ्रीका से अधिक आत्मीयता मिलेगी, लेकिन मुझे और कस्तूरबा को लगा कि दक्षिण अफ्रीका के भारतीय मजदूर अधिक आत्मीय थे। यहां तो खुद को कुछ पराए-से लोगों में पा रहे हैं। उसके बाद गांधीजी का रहन-सहन बदलता गया। उनके कार्यक्रम साधारण लोगों के बीच होने लगे। लोकमानस में उनकी ऐसी पैठ हुई कि मुंबई उतरने के एक पखवाड़े के भीतर, सौराष्ट्र में लोग उन्हें `महात्मा´ कहने लगे। इसके तीन महीने बाद, हरिद्वार के पास गुरुकुल कांगड़ी में भी उन्हें `महात्मा´ कहा जा रहा था।
अगले पच्चीस-तीस बरस तक देश में आत्म-विश्वास की एक लहर चलती रही। लोगों को आभास होता रहा कि उनके कष्टों का निवारण करने के लिए, कोई उनके बीच उपस्थित है। अधिकांश भारतीयों ने तो उन्हें देखा भी नहीं होगा। फिर भी भारतीयों को उनमें एक अवतार-पुरुष और एक दिव्य आत्मा के दर्शन होते रहे।