किसी भी काम को सफलतापूर्वक करने के लिए मेहनत, ईमानदारी, लगन और दृण निश्चय का होना बहुत जरूरी होता है। आज आपको माता पार्वती की ऐसी एक कथा के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे पढ़ने के बाद किसी काम को करने में दृण निश्चय की अहमियत की पाता चलेगा।
शिव-पार्वती कथा
एक बार माता पार्वती भगवान शंकर को पति रूप में पाने के लिए जंगल में कठोर तपस्या कर रही थी। पार्वती की कठोर तपस्या के बाद भगवान शंकर प्रकट हुए और उन्हें वरदान दिया। कुछ देर बाद जिस स्थान पर माता पार्वती तप कर रही थीं, वहीं पास के एक तालाब में मगरमच्छ ने एक लड़के को पकड़ लिया, लड़का चिल्लाने लगा। लड़के ने कहा- हे माता, मेरी रक्षा करें। पार्वती बोली- हे मगरमच्छ! इसको छोड़ दो बदले में तुमको जो चाहिए, मुझसे कहो।
तब मगरमच्छ बोला महादेव के वरदान का फल मुझे दान कर दो, तो छोड़ दूंगा। पार्वती तैयार हो गईं। मगरमच्छ बोला- आप विचार कर लो। पार्वती बोली- मेरा निश्चय पक्का है। मैं तुम्हें अपने तप का फल देती हूं। तुम लड़के को छोड़ दो।
मगरमच्छ ने लड़के को छोड़ दिया और वह दोनों गायब हो गए। इसके बाद मां पार्वती ने फिर से तप करने का संकल्प लिया। इतने में भगवान शंकर प्रकट होकर बोले- हे पार्वती! मगरमच्छ और लड़का दोनों मैं ही था। मैं यह देखना चाहता था कि तुम्हारा चित्त दूसरे का दुःख अनुभव करता है या नहीं। हे देवी! मने अपना तप भी मुझे ही दे दिया है, इसलिए अब और तप करने की आवश्यकता नहीं। भगवान शिव ने कहा कि निश्चय प्रबल हो तो परमात्मा सहित पूरी प्रकृति उसको पूरा करने में लग जाते हैं। जरूरत है अपने निश्चय को मजबूत से मजबूत करते जाने की।