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व्यस्त जीवन की भागदौड़ में अक्सर हम खुद को भी भूल जाते हैं

Mon, 26 Mar 2018 02:02 PM IST
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
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जॉन अपनी नई बाइक से ऑफिस जा रहा था। उसके साथ उसका दोस्त विवेक भी था। गर्मी का मौसम था, पर तभी अचानक बारिश शुरू हो गई। इससे पहले कि बारिश तेज होती, जॉन ने एक बस स्टैंड के पास अपनी बाइक पार्क की और शेड के नीचे रुककर बारिश के थमने का इंतजार करने लगा। विवेक और जॉन आते-जाते लोगों को देखने लगे।

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अचानक उन्होंने देखा कि सामने से एक शख्स आ रहा है, जिसने अपने चश्मे के आगे हाथ लगा रखा है, ताकि कम से कम उसका चश्मा तो बारिश से बच जाए। फिर उन्होंने देखा कि एक अंकल ने एक छोटी-सी कॉपी से अपना सिर ढक रखा है, पर तेज बारिश होने के कारण अंकल को कुछ दिखाई नहीं दे रहा है और वह बार-बार इधर-उधर टकरा रहे हैं। फिर उनकी नजर एक महिला पर पड़ी, जिसने अपना दायां हाथ सिर पर रखा था और बाएं हाथ से पांच-छह साल के बेटे को पकड़ रखा था।

वहीं उनका बेटा एक हाथ से अपनी मां का हाथ पकड़े था और दूसरे हाथ से बारिश की बूंदें इकट्ठा कर रहा था। वह महिला बारिश से बचने की जितनी कोशिश कर रही थी, उसका बेटा बारिश में भीगने का उतना ही जतन कर रहा था। जब महिला शेड के नीचे आकर खड़ी हुई, तब भी उसका बेटा बारिश में भीगता हुआ खड़ा था। बेटा बोला, मां हम यहां क्यों रुके हैं? मां बोली, बस कुछ देर में बारिश रुक जाएगी, फिर हम चल पड़ेंगे। बेटा बोला, बारिश क्यों रुक जाएगी? मां ने उसके सवाल को अनसुना कर दिया।
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विवेक ने जॉन से कहा, देखो, कितना बेवकूफ लड़का है। जॉन बोला, बेवकूफ वह नहीं, हम हैं। वह अपने हर पल को मस्ती से जी रहा है। पर जाने क्यों, हम बड़े होते ही चीजों को उसके स्वाभाविक रूप में देखना भूल जाते हैं। बोलते-बोलते जॉन ने एकदम से विवेक का हाथ पकड़ा और बारिश में धकेलते हुए बोला, चलो, हम भी बच्चे बन जाएं। जिंदगी को रुककर नहीं, खुलकर जिएं।

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