रुचिका रोज समय से पहले ही ऑफिस पहुंच जाती थी। समय की पाबंद होने की वजह से उसे ऑफिस में कई पुरस्कार भी मिल चुके थे। कभी ऐसा नहीं हुआ होगा कि वह पांच मिनट भी देर से पहुंचे। लेकिन उस दिन की शुरुआत ही कुछ अलग हुई थी। आम तौर पर रुचिका की मां सुबह पांच बजे उठ जाया करती थीं, लेकिन उस दिन उनकी नींद नहीं खुली। नींद न खुलने की वजह से मां सुबह पानी नहीं भर पाईं। लिहाजा जब रुचिका उठी, तो समय पर तैयार होने के लिए उसे पड़ोसियों से पानी मांगना पड़ा।
उस दिन ऑफिस में मैनेजिंग डाइरेक्टर आने वाले थे। वह जब घर से निकल कर बस स्टॉप पर खड़ी थी, तभी एक तेज रफ्तार बाइक ने उसके कपड़ों पर कीचड़ उछाल दिया। रुचिका को मजबूरन दोबारा अपने घर जाना पड़ा। जैसे-तैसे जल्दी से कपड़े बदल कर वह निकल ही रही थी कि उसका पैर दरवाजे के कोने से रगड़ गया और काफी खरोंच आ गई। मां ने उसे बिठाकर कहा, मैं दवा लगा देती हूं। पर रुचिका को काफी देर हो चुकी थी, इसलिए वह मां पर ही बरस पड़ी। तभी रुचिका के मोबाइल पर ऑफिस के ही किसी सीनियर का फोन आया। रुचिका फिर चिल्लाई, देखा, अब मैं क्या जवाब दूं सीनियर को? रुचिका ने फोन उठाते ही माफी मांगनी शुरू कर दी, बिना यह सुने कि उसका सीनियर उससे क्या कह रहा है।
तभी उसकी मां ने देखा कि रुचिका बात करते-करते एकदम खामोश हो गई और उसके चेहरे के रंग उतर गए। मां सब छोड़कर उसके पास आ गईं। रुचिका ने फोन रखा और मां की गोद में सिर रखकर रोने लगी। मां ने पूछा, आखिर क्या हुआ? एक दिन लेट ही तो हो गई। इसमें क्या बड़ी बात है! रुचिका बोली, मां, आज आपने मुझे बचा लिया। मेरे ऑफिस की बिल्डिंग कमजोर थी। आज जब सब लोग ऑफिस पहुंचे, तो अचानक बिल्डिंग टूटकर ढह गई। मेरे साथ में जितने लोग काम करते थे, वे सब अब भी बिल्डिंग में फंसे हैं।