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धरती पर दिया श्राद्घ और दान कैसे मिलता है पितरों को?

Tue, 09 Sep 2014 01:27 PM IST
गायत्री तीर्थ शांतिकुंज/ हरिद्वार
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इन दिनों पूरे भारत में श्राद्ध पक्ष चल रहा है। जगह जगह श्राद्ध तर्पण की क्रियाओं द्वारा पितरों को संतुष्ट करने का क्रम चल रहा है। हरिद्वार, काशी, इलाहाबाद आदि सभी तीर्थस्थलों में लोग अपने पितरों के श्राद्ध के लिए पहुंच रहे हैं। क्या आपके मन में यह सवाल नहीं उठता है कि लोग श्राद्ध क्यों करते हैं?
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श्राद्ध का सीधा सा मतलब श्रद्धा से है। श्रद्धापूर्वक किये हुए कार्य को श्राद्ध कहते हैं। सत्कार्यों के लिए सत्पुरुषों के आदर की, कृतज्ञता की भावना रखना श्रद्धा कहलाता है। श्रुति और स्मृतियों में विधान पाया गया है कि मृत्यु के पश्चात पितृपक्ष में तिथि अनुसार श्राद्ध करने से व जल की अंजलि भर देने से स्वर्गीय पितृदेवों को मोक्ष प्राप्त होता है।

इन्हीं विशेष अवसरों पर हम अपने पूर्वजों के लिए अन्न, वस्त्र, पात्र आदि दान करते हैं और आशा करते हैं कि ये वस्तुएं हमारे पितरों को प्राप्त होंगी। भौतिक दृष्टि से दी गयी यह सामग्री ब्राह्मणों को प्राप्त होती है, किन्तु सूक्ष्म में यह दान पितरों को आत्मतृप्ति प्रदान करता है।
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मरे हुए व्यक्ति का श्राद्ध करने से कुछ लाभ होता है या नहीं? शास्त्रों के अनुसार मर जाने के उपरान्त जीव का अस्तित्व मिट नहीं जाता। वह किसी न किसी रूप में इस संसार में ही रहते है। स्वर्ग, नर्क, निर्देह, गर्भ आदि किसी न किसी अवस्था में इस संसार में वह बने रहते हैं। इसीलिए श्राद्ध की महत्ता है। श्राद्ध पूर्ण श्रद्धा, मनोयोग से करने पर पितरों के आशीर्वाद प्राप्त होते हैं।
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