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इसी धरती पर मिल सकता है स्वर्ग

Fri, 28 Dec 2012 02:00 PM IST
राकेश/इंटरनेट डेस्क।
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कहते हैं कि व्यक्ति को अपने कर्म के अनुसार मृत्यु के पश्चात स्वर्ग अथवा नर्क में स्थान प्राप्त होता है। मृत्यु के बाद क्या होता है जीवात्मा कैसे यमराज के दरबार में पहुंचता है। इसका वर्णन पुराणों एवं धर्म ग्रंथों में लिखा हुआ मिलता है। ग्रंथों में लिखी हुई बातों को हम प्रमाणिक तौर पर जान नहीं सकते हैं क्योंकि मृत्यु के बाद की स्थिति को वही जान सकता है जो जीवित न हो।
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जो जीवित नहीं होगा वह मृत्यु के बाद की स्थिति का वर्णन नहीं कर सकता है क्योंकि आत्मा तो छाया मात्र है। छाया न तो सुन सकती है और न बोल सकती है। यानी जीवन के बाद की स्थिति पर से रहस्य का पर्दा हटाना हम मनुष्य के सामर्थ्य के बाहर की चीज है। इसलिए हम सभी को ग्रंथों एवं पुराणों में लिखी बातों को ही स्वीकार करना पड़ेगा।

पुराणों के अनुसार स्वर्ग में व्यक्ति को उसकी इच्छा के अनुसार सभी प्रकार का सुख प्राप्त होता है। स्वर्ग में न तो गर्मी है न सर्दी। स्वर्ग का मौसम सदैव अनुकूल रहता है। यहां सभी प्रकार का स्वादिष्ट भोजन मिलता है। व्यक्ति को ऊंचा आसन मिलता है। शास्त्रों के अनुसार जो बहुत ही पुण्यवान होता है उसे स्वर्ग में इन्द्र का पद प्राप्त होता है। अर्थात इन्द्र कोई व्यक्ति नहीं बल्कि एक पद है जो व्यक्ति को उसके कर्म के फल से प्राप्त होता है। जब पुण्य समाप्त हो जाता है तो इन्द्र को अपना पद छोड़ना पड़ता है।
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इसके विपरीत नर्क में कष्टकारी मौसम है। यहां पर अशुद्ध और दूषित भोजन प्राप्त होता है। जीवात्मा को तरह-तरह की यातनाएं सहनी पड़ती है। अगर स्वर्ग और नर्क की इस परिभाषा पर गौर किया जाए तो हम पाते हैं कि स्वर्ग और नर्क दोनों ही इसी धरती पर है। जो व्यक्ति सद्कर्म करता है, ज्ञान अर्जित करता है और अपनी बुद्धि को सन्मार्ग पर लगाता है उसे उच्चपद प्राप्त होता है। मान-सम्मान मिलता है। एयरकंडीशनर घर में रहने का अवसर मिलता है। हर तरह की सुख-सुविधाएं एवं रूचिकर भोजन प्राप्त होता है। यह सब स्वर्ग प्राप्ति के लक्षण हैं।

इसके विपरीत बहुत से लोग ऐसे होते हैं जिन्हें दिन-रात मेहनत करनी पड़ती है। न तो इन्हें अच्छा घर मिलता है और न अच्छा भोजन। शारीरिक कष्ट एवं रोग भी इन्हें काफी परेशान करता है। यह सब नर्क की निशानी है।

सभी पुराण एवं शास्त्रों में कहा गया है कि कर्म के अनुरूप ही स्वर्ग और नर्क मिलता है। इसका उदाहरण है कि अच्छे परिवार में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी बुरे कर्मों के कारण स्वर्ग के समान सुख खो देता है और उसे जीवन में कष्ट भोगना पड़ता है। दूसरी ओर गरीब परिवार में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी अच्छे कर्मों से स्वर्ग के समान सुख प्राप्त कर लेता है। इसलिए मरने के बाद स्वर्ग की अभिलाषा की बजाय जीते जी स्वर्ग पाने के लिए सदैव सद्कर्मों में लगे रहना चाहिए।
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