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दीपावली मनाएं लेकिन इन बातों को याद रखें

Fri, 01 Nov 2013 04:23 PM IST
अध्यात्मिक गुरू/ गुरू मां अानंदमूर्ति
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दीये जलाओ, बैठो उनके पास, देखो उनकी रोशनी को और देखो कैसे धीरे-धीरे तेल खत्म होता जाता है और फिर झिलमिला कर बुझ जाता है। ठीक इसी तरह से इस शरीर में भी आयुष रूपी तेल है और प्रारब्ध की बत्ती जल रही है और जीवन चल रहा है।
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लेकिन हर श्वास जो शरीर से बाहर निकाल रहे हो, उससे आयुष का तेल कम होता जाता है। जैसे बाहर के दीये को देखते हो, ऐसे अपने श्वासों के दीये को भी देखना चाहिए। हर आती श्वास जन्म दे रही है, हर जाती हुई श्वास मृत्यु ला रही है और पास, और पास। फिर एक दिन यह शरीर रूपी दीया बुझ जाएगा।

दीवाली पर दीए खरीदकर लाते हैं तो रंगों से सजाते हैं, तेल डालते हैं, रुई की बत्तियां रखते हैं, जलाते हैं। जरा-सी लौ धीमी हो जाए तो जल्दी से तेल डालते हैं ताकि बुझे नहीं। लेकिन दीवाली की अगली सुबह रातभर जलकर काले हुए दीपकों को इकट्टा करके बेरहमी से कूड़े के ढेर पर फेंक देते हैं। हम मानते हैं जिस दीए ने रातभर जलकर अंधेरे से मुक्त किया है उस दीपक को अगले दिन कूड़े में फेंकना भी सार्थक हो गया। अफसोस तो उन दीपकों के लिए होगा जो जले ही नहीं और बिना जले ही उनको फेंक दिया जाए।
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तो जिस मानव देह में ज्ञान की रोशनी जल जाए वह देह जब मरेगी तो उसका मरना भी सार्थक होता है। अफसोस तो उन शरीरों पर है जो बिना जले ही मर जाते हैं, बिना ज्ञान को प्राप्त किए चले जाएंगे वैसे, दीवाली शुभ है या अशुभ? कई लोग दीवाली के अगले दिन को दीवाला बोलते हैं।

‘शुभ दीवाली ऐसा तो सब बोलते हैं लेकिन अशुभ दीवाले को याद करना कोई पसंद नहीं करता। अगले दिन जले हुए पटाखों के ढेर, खाली मिठाई के डिब्बे, सजावट का सब सामान गलियों, सड़कों, घरों की छतों पर बिखरा हुआ होता है। ये दीवाला ही तो होता है।

तो शुभ और अशुभ कुछ नहीं होता इसलिए जब कोई बोलता है ‘हैप्पी दीवाली तो लगता है अभी भी वह बच्चा ही है। अशुभ भी बड़ा प्रिय है क्योंकि शुभ, अशुभ के बगैर कुछ नहीं है। शुभ को होने के लिए अशुभ की जरूरत होती है। मृत्यु है तो जन्म की खुशी होती है। दोनों साथ चलते हैं, तो जिसने सब कुछ स्वीकार कर लिया, ऐसा ज्ञानवान होकर जीए उसके लिए शुभ तो है ही, अशुभ भी शुभ हो जाता है।

जो यह कहते हैं, ‘सुख मिले पर दुख न मिले वह दुख को अपने पास बुलाते हैं। मन को खाली रखें।  जब तक मन शून्यता से न भर जाए, जब तक मन पूर्णतः निर्विचार न हो जाए, तब तक मन में ज्ञान का विचार लायें। जब तक मन बंधनरहित न हो जाए, तब तक मन में परमात्मा के प्रति बधन को बनाएं। ‘प्रभु आप हमारे हो, प्रभु! हमारा आपके बगै़र कोई नहीं है। ऐसी प्रार्थना करो। दुनियावी बंधन तो मारते हैं लेकिन परमात्मा क़े प्रति बनाया गया यह रिश्ता, यह आत्मीयता, भक्ति, प्रेम का जो संबंध होता है यह हमें मोक्ष की ओर ले जाता है।

अमावस्या है तो दीवाली की रोशनी है। अगर अमावस्या न हो, पूर्ण चंद्रमा हो तो दीवाली भी फीकी हो जाएगी। इसलिए घोर काली रात में, कालिमा की पृष्ठभूमि में, जब ये दीपक जलते हैं तभी खूबसूरत लगते हैं। ऐसे ही मन के अंधकार की पृष्ठभूमि में जब ज्ञान का दीपक जलता है तो मन के अंदर भी दीवाली हो जाती है।

तो यह दीवाली का लक्ष्य है कि बाहर दीपक जलाओ और यह याद करो कि अंदर का दीपक जलाना है। बाहर मिठाई खाओ पर यह याद रहे कि आनंद का जो सबसे उत्तम मीठा फल है वह मुझको भी खाना है।
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