प्रत्येक मनुष्य इस संसार में सुंदर व महान है। परंतु सही मायने में वह किना सुंदर है, कितना सुंदर खजाना उसके ही अंदर छिपा है, इसका बोध उसे नहीं है। इस धरती पर जब-जब महापुरुषों का आगमन हुआ तथा उनका सान्निध्य जिन लोगों को मिला, उन्होंने ही जीवन की सुंदरता का सही मायने में एहसास किया। इसलिये शास्त्रों में गुरु की महिमा अनंत बताई गई है।
हर मनुष्य के अंदर सुखी होने की जन्मजात इच्छा होती है। इस इच्छा की पूर्ति के लिये वह जीवन भर मनसा, वाचा, कर्मणा प्रयास करता रहता है। परंतु यह खोज वह बाहर करता है। प्रयास करते-करते जीवन का अंत हो जाता है। परंतु हृदय प्यासा ही रहता है। भूत व भविष्य की चिंताओं में ही वह रहता है, जब कुछ भी हाथ नहीं लगता तो मनुष्य बेचैन होता है। क्योंकि वह सच्चा सुखद एहसास जिससे सचमुच में हृदय तृप्त होता है वह न तो भूत में है और न ही भविष्य में।
सच्चा सुखद एहसास तो वर्तमान में है, स्वयं अपने आप में विद्यमान है। अपने मन व इंद्रियों के वशीभूत होकर मनुष्य इतना बहिर्मुख हो जाता है कि, वह अपने हृदय की पुकार नहीं सुन पाता, उसे यह आभास तक नहीं हो पाता कि वह इस संसार में आखिर क्यों हैं?
गुरु की कृपा से उस सच्चे प्रेम को, उस सुखद एहसास को अनुभव करना प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सांसारिक कर्तव्यों को निभाते हुये संभव है। चाहे वह किसी भी जाति, वर्ग, धर्म संस्कृति, रूप, रंग का क्यों न हो। बस जरूरत है खुले हृदय से, दीन-भाव से, जिज्ञासु भाव से ज्ञानदाता के समक्ष अपनी हार्दिक इच्छा जाहिर करने की।
इस प्रकार जब किसी व्यक्ति के जीवन में अज्ञानता का पर्दा हटता है और ज्ञानदाता की कृपा हो जाती है तो वह अपने जीवन में, सही मायने में इस जीवन के प्रति, ज्ञान के प्रति, ज्ञानदाता के प्रति कृतज्ञ होता है और वास्तव में यही जीवन की सच्ची उपलब्धि है।
साभारः परमहंस दाती जी महाराज
दाती जी महाराज
दाती जी महाराज का जन्म 10 जुलाई 1950 को राजस्थान के पाली जिला में अलावास गांव में हुआ। दाती जी महाराज बचपन से ही तीक्ष्ण बुद्घि के स्वामी थे। बाल्यकाल में ही इनका लगाव ईश्वर से हो गया था। इन्होंने संसार में व्याप्त ज्योतिष, ध्यान और शनि संबंधित भ्रांतियों को दूर करने का विचार किया। इनकी विद्या, ज्ञान और कृपा से बहुत से भक्त लाभ प्राप्त कर रहे हैं। दाती जी के तीन प्रमुख सिद्घांत हैं सेवा, सतसंग और सुमिरन।