राजा अश्वघोष के मन में अचानक एक दिन वैराग्य की इच्छा जाग गई। घर-परिवार छोड़कर वह यहां-वहां ईश्वर और शांति की खोज में लगातार भटकने लगे। कई दिनों के भूखे-प्यासे अश्वघोष एक दिन भटकते हुए एक किसान के खेत पर पहुंचे।
वह किसान प्रसन्न, स्वस्थ और संतुष्ट लग रहा था। अश्वघोष ने उससे पूछा, मित्र तुम्हारी इस प्रसन्नता का आखिर राज क्या है? देखने में तो तुम मुझे थोड़े गरीब या सामान्य किसान ही लगते हो। किसान ने मुस्कराते हुए कहा, राजन, मुझे सभी जगह ईश्वर मौजूद दिखाई देता है और उसकी उपस्थिति में परिश्रम करते हुए मुझे खुशी और संतुष्टि मिलती है।
इस पर हैरान अश्वघोष ने उससे पूछा कि क्या उस ईश्वर के दर्शन और अनुभव तुम मुझे करा सकते हो? किसान ने तुरंत जवाब दिया, क्यों नहीं? सबसे पहले आप कुछ खा-पी लें, क्योंकि आप तो कई दिनों के भूखे लग रहे हैं। अश्वघोष ने किसान का आतिथ्य स्वीकार कर लिया। किसान ने अपने घर से आई रोटियां दो भागों में बांटीं।
दोनों ने नमक-मिर्च की चटनी से रोटियां खाईं। भोजन करने के बाद किसान ने राजा को खेत में हल चलाने के लिए कहा। थोड़ी देर में ही श्रम से थके हुए और कई दिनों बाद मिले भोजन से तृप्ति मिलने के कारण राजा अश्वघोष को नींद आने लगी।
किसान ने आम के पेड़ के नीचे छाया में उन्हें सुला दिया। जब राजा अश्वघोष सोकर उठे, तो उस दिन उन्हें जैसी शांति और हल्केपन का एहसास हुआ, वह महल की तमाम सुख-सुविधाओं में भी उन्हें आज तक नहीं हुआ था। इस तरह राजा को अपने प्रश्न का जवाब खुद ही मिल गया था।