मानवी-जीवन को श्रेष्ठ और समुन्नत बनाने के लिये सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करना और जीवन में उतारना अत्यन्त आवश्यक है। मनुष्य-जीवन का सच्चा मार्गदर्शक एवं आत्मा का भोजन है स्वाध्याय। स्वाध्याय से जीवन को आदर्श बनाने की सत्प्रेरणा स्वतः मिलीती है।
स्वाध्याय हमारे चिंतन में सही विचारों का समावेश करके चरित्र-निर्माण करने में सहायक बनता है, साथ ही ईश्वर प्राप्ति की ओर अग्रसर कराता है। स्वाध्याय स्वर्ग का द्वार और मुक्ति का सोपान है।
विचार-परिष्कार का अमोघ उपाय अध्ययन एवं सत्संग को ही बतलाया गया है। विचारों में संक्रमण एवं ग्रहणशीलता रहती है। जब मनुष्य अध्ययन में निरंतर संलग्न रहता है, तब उसको अपने विचार द्वारा विद्वानों के विचारों के बीच से बार-बार गुजरना पड़ता है। पुस्तक में लिखे विचार अविचल एवं स्थिर होते हैं।
उनमें प्रभावित होने अथवा बदलने का प्रश्न ही नहीं उठता। स्वाभाविक है कि अध्ययनकर्त्ता के ही विचार प्रभाव ग्रहण करते हैं। जिस प्रकार के विचारों की पुस्तक पढ़ी जाएगी, अध्येता के विचार उसी प्रकार ढलने लगेंगे, इसलिए अध्ययन के साथ यह प्रतिबन्ध भी लगा दिया गया है कि अध्येता उन्हीं ग्रंथों को अध्ययन करें जो प्रामाणिक एवं सुलझे हुए विचारों वाले हों।
संसार में जितने भी महापुरुष, वैज्ञानिक, संत-महात्मा, ऋषि, महर्षि आदि हुए हैं, उन्होंने स्वाध्याय से ही प्रगति की है। स्वाध्याय का अर्थ स्व का अध्ययन है। स्व का अध्ययन कराने में सबसे सहायक माध्यम हैं-सत्साहित्य एवं वेद उपनिषद्, गीता आर्ष-ग्रन्थ तथा महापुरुषों के जीवन-वृत्तान्तों का अध्ययन करना।