यदि आप यह सोचते हैं कि पूर्ण स्वस्थ रहना बहुत कठिन कार्य है, एक बार फिर सोचें श्री श्री रविशंकर हमें बताते हैं कि किस प्रकार सामान्य बातें आश्चर्य चकित रुप से हमारे जीवन को सुधार सकती हैं। एक पूर्ण स्वस्थ अवस्था के लिये, एक व्यक्ति को मानसिक रुप से शांत, स्थिर और भावनात्मकता के रुप से कोमल रहना होगा। यह आजकल की तेज रफ्तार वाले जीवन में इतना सरल नही है। अपने तनाव के स्तर को संभालने के लिये दो माध्यम है। हम अपने मानसिक और शारीरिक कार्य भार में कमी लायें। या फिर अपनी ऊर्जा के स्तर को बढ़ायें।
अपनी ऊर्जा को बढ़ाने का और स्वयं को स्फूर्तिवान बनाने के 5 सरल उपायः
1 स्वयं को जानें
हमें अपने अस्तित्व सभी स्तर को जानना होगा- शरीर, श्वास, मन, बुद्धि, स्मृति, अहं और स्व। इससे हमें वर्तमान क्षण में रहने में सहायता मिलती है और जीवन के सुर से सुर मिल जाता है। हर वर्ष एक सप्ताह का समय चुनो, जिस प्रकार एक कार सर्विस के लिए जाती है। इस सप्ताह में अपने अंतर को प्रकृति के साथ लय बद्घ कर लें, सूर्योदय के साथ उठे, योगाभ्यास करें, सही भोजन करें और गीत संगीत के साथ कुछ समय गुजारें।
2. ध्यान को जीवन का हिस्सा बना लें
ध्यान से गहरा विश्राम मिलता है। जो गहरा विश्राम करता है, वह ज्यादा सक्रियता से काम कर पाता है। पूर्ण अध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिय तो ध्यान एक कुंजी है। ध्यान का अर्थ है-मन बिना क्रोध के, संकोच के और प्रतिक्रिया के हो और वर्तमान क्षण में हो।
3 श्वास के बारे में जानें
श्वास जीवन है। हमें न तो विद्यालय में और न ही घर में श्वास के महत्व के बारे बताया गया है। यदि हमे हमारी श्वास की शक्ति के बारे में समझ में आ जाये तो हमें हमारे विचार और अनुभव का ज्ञान हो जायेगा। हम अपने क्रोध और नकारात्मकता को जीत सकते हैं।
4 सही भोजन करें
एक स्वस्थ शरीर और हमारी भावनाओं, विचारों और कर्मों के नियंत्रण के लिये हमें यह ध्यान रखना होगा कि हम क्या खा रहे हैं। ऐसा कहा जाता है ‘जैसा अन्न वैसा मन‘। जो कुछ भी हम भोजन करतें हैं उसका हमारे शरीर और मन पर पूरा प्रभाव पड़ता है। ताजा भोजन, फल और कुछ सब्जियों से हमारे प्राण ऊर्जा में वृद्घि होती है, जंक भोजन एवं डिब्बा बंद भोजन में कम प्राण ऊर्जा होती है। ताजा भोजन एक सर्वोत्तम पोषक भोजन होता है जो उत्साह, स्फूर्ति, जीवटता, शक्ति और दीर्घ आयु प्रदान करता है।
5 स्वयं के लिये समय निकाले
हर दिन हम अपना सारा समय सूचना एकत्रित करने में ही निकालते हैं और स्वयं के लिये कोई समय नही निकाल पाते। ऐसा करने पर हम स्वयं थका हुआ और उदास पाते है। कुछ देर का मौन रचनात्मकता को बढ़ाता है। मौन से स्वयं में शक्ति का संचार होता है और स्वयं को गहराई और स्थिरता देता है। दिन में कुछ समय आंखे बंद करके स्वयं के दिल में बैठ कर संसार को एक गेंद की तरह किक मारो।
स्रोतः आर्ट ऑफ लिविंग
श्री श्री रविशंकर परिचय
मानवीय
मूल्यवादी, शांतीदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर,
का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी
रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के
सान्निध्य में भेज दिया। महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे
प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना
है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास
लेने की तकनीक) की खोज की।