अंधेरा कितना ही हो, चिंता न
करो। अंधेरे का कोई अस्तित्व ही नहीं होता। अंधेरा कम और ज्यादा थोड़े ही होता है;
पुराना-नया थोड़े ही होता है। हजार साल पुराना अंधेरा भी, अभी दीया जलाओ और मिट
जाएगा। और घड़ी भर पुराना अंधेरा भी, अभी दीया जलाओ और मिट जाएगा। अंधेरा अमावस की
रात का हो तो मिट जाएगा। और अंधेरा साधारण हो तो मिट जाएगा। अंधेरे का कोई बल नहीं
होता।
अंधेरा दिखाई बहुत पड़ता है, मगर बहुत निर्बल है, बहुत नपुंसक है।
ज्योति बड़ी छोटी होती है, लेकिन बड़ी शक्तिशाली है। क्योंकि ज्योति परमात्मा का
अंश है; ज्योति में परमात्मा स्थित है। अंधेरा तो सिर्फ नकार है, अभाव है। अंधेरा
है नहीं। इसीलिए तो अंधेरे के साथ तुम सीधा कुछ करना चाहो तो नहीं कर सकते। न तो
अंधेरा ला सकते हो, न हटा सकते हो।
दीया जला लो, अंधेरा चला गया। दीया बुझा
दो, अंधेरा आ गया। सच तो यह है कहना कि अंधेरा आ गया, चला गया-ठीक नहीं; भाषा की
भूल है। अंधेरा न तो है, न आ सकता, न जा सकता। जब रोशनी नहीं होती है तो उसके अभाव
का नाम अंधेरा है। जब रोशनी होती है तो उसके भाव का नाम अंधेरे का न होना
है।
अंधेरा कितना ही हो और कितना ही पुराना हो, कुछ भेद नहीं पड़ता। जो दीया
हम ला रहे हैं, जो रोशनी हम जला रहे हैं, वह इस अंधेरे को तोड़ देगी; तोड़ ही देगी।
बस रोशनी जलने की बात है। इसलिए अंधेरे की चिंता न लो। रोशनी के लिए ईंधन बनो। इस
प्रकाश के लिए तुम्हारा स्नेह चाहिए। स्नेह के दो अर्थ होते हैं: एक तो प्रेम और एक
तेल। दोनों अर्थों में तुम्हारा स्नेह चाहिए-प्रेम के अर्थों में और तेल के अर्थो
में-ताकि यह मशाल जले।
अंधेरे की बिलकुल चिंता न लो। अंधेरे का क्या भय!
सारी चिंता, सारी जीवन-उर्जा प्रकाश के बनाने में नियोजित कर देनी है। और प्रकाश
तुम्हारे भीतर है, कहीं बाहर से लाना नहीं है। सिर्फ छिपा पड़ा है, उघाड़ना है।
सिर्फ दबा पड़ा है, थोड़ा कूड़ा-कर्कट हटाना है। मिट्टी में हीरा खो गया है, जरा
तलाशना है।
और तूने कहाः ‘प्रकाश के दुश्मन भी बहुत हैं!’ सदा से हैं। कोई
नयी बात नहीं। मगर क्या कर पाए प्रकाश के दुश्मन? प्रकाश के दुश्मन खुद दुःख पाते
हैं-और क्या कर पाते हैं! जिन्होंने सुकरात को जहर दिया, तुम सोचते हो सुकरात को
दुखी कर पाए? नहीं, असंभव! खुद ही दुःखी हुए, खुद ही पश्चाताप से भरे, खुद ही
पीड़ित हुए।
सुकारात को सूली की सजा देने के बाद न्यायाधीश सोचते थे कि
सुकरात क्षमा मांग लेगा। क्षमा मांग लेगा तो हम क्षमा कर देंगे। क्योंकि यह आदमी तो
प्यारा था; चाहे कितना बगावती हो, इस आदमी की गरिमा तो थी। असल में सुकरात जिस दिन
बुझ जाएगा, उस दिन एथेंस का दीया भी बुझ जाएगा-यह भी उन्हें पता था।
सुकरात
की मौत के बाद एथेंस फिर कभी ऊचाइयां नहीं पा सका। आज क्या है एथेंस की हैसियत? आज
एथेंस की कोई हैसियत नहीं है। इन ढाई हजार सालों में सुकरात के बाद एथेंस ने फिर
कभी गौरव नहीं पाया; कभी फिर स्वर्ण नही चढ़ा एथेंस पर। और सुकरात के समय में एथेंस
विश्व की बुद्धिमत्ता की राजधानी थी। विश्व की श्रेष्ठतम प्रतिभा का प्राकट्य वहां
हुआ था। एथेंस साधारण नगर नहीं था, जब सुकरात जिंदा था। सुकरात की ज्योति से
ज्योतिर्मय था, जगमग था।
साभारः ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन, नई दिल्ली
पुस्तकः उत्सव आमार जाति, आनंद आमार
गोत्र
प्रवचन नं. 9 से संकलित
परिचय
ओशो रजनीश का जन्म 11 दिसम्बर 1931 को मध्य प्रदेश में
रायसेन जिला के अंतर्गत कुचवाड़ा ग्राम में हुआ। ओशो अपने पिता की ग्यारह
संतान में सबसे बड़े थे। 1960 के दशक में वे 'आचार्य रजनीश' एवं 'ओशो भगवान
श्री रजनीश' नाम से जाने गये।
ओशो ने सम्पूर्ण विश्व के रहस्यवादियो,
दार्शनिको और धार्मिक विचारधाराओं को नवीन अर्थ दिया। अपने क्रान्तिकारी
विचारों से इन्होने लाखों अनुयायी और शिष्य बनाये। 19 जनवरी 1990 को ओशो
परमात्मा में विलीन हो गये।