जब एक कली
समाप्त होती है तब वह एक फूल बन जाती है और जब एक एक हृदय समाप्त हो जाता तब वह
दिव्य हो जाता है। एक विदीर्ण हृदय का अर्थ है, अधूरी इच्छाएं, अपेक्षाएं और
आशावादिता। एक सच्चे प्रेम में दिल टूटता नही है। क्या पानी टूट सकता है? पानी तरल
है। प्रेम भी तरल है। जो भी तरल है वह भंगुर नही हो सकता है। जो कुछ भी अकड़ा हुआ
है वह टूट सकता है।
जीवन घटनाओं से भरपूर है, कुछ अच्छी और कुछ बुरी, कुछ
पसंदीदा और कुछ नापंसदीदा। कई बार ऐसा होता है कि, आप कुछ कर रहे थे लेकिन उससे
दूसरे आहत हो जाते हैं, आप ऐसा करना नही चाहते थे। और फिर या तो आपका अपना दिल टूट
हुआ अनुभव होता है या उनका। यह एक परिपक्व मन का या परिपक्व प्रेम का लक्षण नहीं
है। तो जब अगली बार उस मित्र से मिलो या उस पूर्व के साझेदार से मिलो तो ऐसे मिलो
जैसे पहले कुछ हुआ ही नही था या उनसे आप पहली बार मिल रहे हो।
आपको कोई
सफाई देने की आवश्यकता नही है। ठीक है, कभी आप साझेदार रहे होंगे और ऐसा कुछ हो गया
जो आप नही करना चाहते थे और आप अलग हो गये। एक बार फिर आप उनके पास जाएं और उन से
बात करें। उनसे मित्रवत मिलो जैसे कुछ हुआ ही नही। ऐसे जिओ जैसे आपका कोई शत्रु नही
है।
हमारी परेशानी क्या है कि, हम अपने प्रेम को इतना प्रदर्शित कर देते हैं
कि थोड़े समय बाद हमें लगता है कि हमारे पास और कुछ देने के लिए है ही नही। आपने सब
कुछ प्रदर्शित कर दिया। अब सब खाली हो गया। तो यदि प्रेम अत्यधिक प्रदर्शित कर दिया
जाये तो इसकी आयु छोटी हो जाती है। यह एक बीज के समान है। आपको इसे उगाना होता है,
धरती के भीतर, ज्यादा कुछ दिखाई नही पड़ता। तब आपके कार्यों में यह प्रकट होने लगता
है।
इसे बार-बार कहकर, ‘‘ओह! मैं तुमसे प्यार करता हूं, मैं तुमसे प्यार
करता हूं, मैं तुमसे प्यार करता हूं। ‘‘आपने सब नष्ट कर दिया। सच्ची अंतरंगता यही
है कि आप पहले से अंतरंग हो और इस बारे में निश्चिंत हों, आप दूसरों को यह कह कर
उनको ये विश्वास नही दिलाते हो कि आप उनसे गहरे जुड़े हो, आप अपने भाव बार-बार
प्रकट नही करते हो। अपने प्रेम को बार-बार सिद्ध करना ही सबसे बड़ी समस्या है। आपको
किसी को विश्वास दिलाने की आवश्यकता नही है, ‘‘मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं।
‘‘यदि वह समझते हैं तो समझ जाएंगे।"
आप अपनी अंतरंगता को बताने के लिये
जितने चिंतित होते हों उतनी अंतरंगता नष्ट हो जाती है। यह बहुत महत्वपूर्ण है। आप
बस जानकारी रखें, आप मुस्कुराएं और उनको आपके साथ अंतरंगता का अनुभव होने दें। अपने
प्रेम को बताने के लिए जल्दबाजी न दिखायें। उन्हें यह स्वयं ही समझने दें कि आप
उनके हैं और वे आपके हैं। अन्य लोगों को यह समझाने का प्रयास ना करें कि आप उनसे
प्रेम करते हैं। और आप यह भी शक ना करे कि वे आप से प्रेम करते है या नही। इसे
स्वभाविक ही लें, ‘‘हां, हर कोई मुझ से प्यार करता है।" क्या आप जानते हैं कि क्या
होगा? यहां तक प्रेम का अभाव और शक दोनो ही समाप्त हो जाएंगे। यह एक रहस्य
है।
सभी लोगों को एक निश्चित व्यक्तित्व में नही देखें। हर व्यक्तित्व बदल
रहा है। एक अच्छा व्यक्ति भी आपके कर्मों के या स्पंदनों के कारण आपको कुछ गलत शब्द
कह सकता है यदि उस समय आपको व्यथित होना है। एक गलत व्यक्ति भी आपको आपके अच्छे
कर्मों के कारण आपकी सहायता करना आरंभ कर देता है। एक अद्भुत व्यक्ति या सज्जन
व्यक्ति आपको कुछ कहकर आहत कर सकता है, लेकिन वास्तव में आपको कोई भी आहत नही कर
सकता।
यह आप स्वयं ही हैं जो आहत होते हैं। सही अंतरंगता तो वास्तव में वही
है जो यह समझ सके कि अन्य कोई व्यक्ति तो है ही नही। जब मन इस अद्वैत में आ जाता है
तब मन समाप्त हो जाता है, गायब हो जाता है। यह सब मैं ही हूं, यह सब मेरे ही अंग
हैं। अद्वैत पर केंद्रित होना विकास का पथ है। यह तब आपके मन और दिल के भारीपन को
दूर कर देता है। तब प्रेम बहता है। यह प्रेम दिव्य प्रेम है, ठीक वैसे ही जैसे एक
बड़ा सा सुंदर सा पूष्प पूरा खिला हुआ हो। यहां पर कोई भेद नही है, सब कुछ मैं ही
हूं और मेरा ही हिस्सा है। यही सच्ची अंतरंगता है।
स्रोतः आर्ट ऑफ
लिविंग
श्री श्री रविशंकर परिचय
मानवीय मूल्यवादी, शांतीदूत और आर्ट ऑफ
लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के
पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए
इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया। महर्षि के अनेकों शिष्यों में
से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों
का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास
लेने की तकनीक) की खोज की।