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जीवन का गूढ़ रहस्य दिवाली के पटाखों में: श्री श्री रवि शंकर

Mon, 12 Nov 2012 11:49 AM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
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दीपक की बाती को जलने के लिये उसे तेल में डूबे होना चाहिये, और साथ ही तेल के बाहर भी रहना चाहिये। यदि बाती तेल में पूरी डूब जाये तो वह प्रकाश नहीं दे सकती। जीवन भी दीपक की बाती के समान है, तुम्हें संसार में रहते हुए भी उसके ऊपर निष्प्रभावित रहना होता है। अगर तुम पदार्थ जगत में डूबे हुए हो, तो जीवन में आनन्द और ज्ञान नहीं ला पाओगे। संसार में रहते हुए भी, सांसारिक माया के ऊपर उठकर हम आनन्द और ज्ञान के ज्योति प्रकाश बन सकते हैं।
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इस प्रकार से ज्ञान के प्रकाश के प्रकट होने का उत्सव ही दिवाली है। दीपावली बुराई पर अच्छाई का, अन्धकार पर प्रकाश का और अज्ञान पर ज्ञान के विजय का त्योहार है। इस दिन घरों में करी जाने वाली रोशनी न केवल सजावट के लिये होती है, बल्कि वह जीवन के गहरे सत्य को भी अभिव्यक्त करती है। हरेक दिल में प्रेम और ज्ञान की लौ को प्रज्जवलित करें और सभी के चेहरों पर सच्ची मुस्कान लायें।

प्रत्येक मनुष्य में कुछ सद्गुण होते हैं। आपके द्वारा प्रज्ज्वलित प्रत्येक दीपक इसी का प्रतीक है। कुछ में धैर्य होता है, कुछ में प्रेम, शक्ति, उदारता, अन्य में लोगों को साथ मिलाकर चलने की क्षमता होती है। जीवन का एक और गूढ़ रहस्य दिवाली के पटाखों के फूटने में है। जीवन में कई बार आप पटाखों के समान अपनी दबी हुई भावनाओं, कुंठाओं और क्रोध के कारण अति ज्वलनशील रहते हैं – बस फूटने के लिये तैयार।
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अपने राग- द्वेष, घृणा आदि को दबाकर फटने की उस स्थिति तक पहुँच जाते कि अब फूटे कि तब। पटाखे फोड़ने की प्रथा हमारे पूर्वजों द्वारा, लोगों की दबी हुई भावनाओं से मुक्ति पाने का एक सुन्दर मनोवैज्ञानिक उपाय है। जब आप बाहर विस्फोट देखते हैं तो आपके अंदर भी वैसी ही कुछ अनुभूति होती है।
 
दीपावली की मिठाइयों और उपहारों के आदान प्रदान के पीछे भी एक मनोवैज्ञानिक पहलू है। पुरानी गलतफ़हमी की कड़वाहट को छोड़कर सम्बन्धों को मधुर बनाते चलो। सेवा भाव के बिना हर उत्सव अधूरा है। परमात्मा ने जो कुछ भी हमें दिया है उस प्रसाद को हमें सबके साथ बाँटना है। क्योंकि जितना बाटेंगे उतनी ही उसकी कृपा और बरसती है। सही मायने में यही दीपावली का उत्सव है। उत्सव का और एक अर्थ है - अपने मतभेदों को मिटाकर अद्वैत आत्मा की ज्योति से अपने सच्चिदानन्द स्वरूप में विश्राम करना। दिव्य समाज की स्थापना के लिये हर दिल में ज्ञान व आनन्द की ज्योत जलानी होगी। वह तभी सम्भव है यदि सब एक साथ मिलकर ज्ञान का उत्सव मनायें।
 
अधिकतर उत्सव में हम अपनी सजगता या एकाग्रता खोने लगते हैं। उत्सव में सजगता बनाए रखने के लिये, हमारे ऋषियों नें प्रत्येक उत्सव को पावन बनाकर पूजा विधियों के साथ जोड़ दिया। इसलिये दिवाली भी पूजा का समय है। दिवाली का आध्यात्मिक पहलू उत्सव में गहरायी लाता है। जो अज्ञानी हैं हैं उनके लिये वर्ष में एक बार ही दिवाली आती है, किंतु जो ज्ञानी हैं उनके लिये प्रत्येक दिन, प्रतिक्षण दिवाली है। इस दिवाली को ज्ञान के साथ मनायें और मानवता की सेवा करने का संकल्प लें।

श्री श्री रविशंकर
मानवीय मूल्य्वादी, शांतीदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया। महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।
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स्रोत - आर्ट ऑफ लिविंग
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